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[ गो. प्र. चिन्तामणि वन में उत्पन्न होने वाले कल्पवृक्ष, जुही, पारिजातक, जयाकुसुम और तगर (आदि उत्तम वृक्षों से उत्पन्न ) पुष्पों से तथा सुर्वण चांदी से निर्मित फूलों से और नाना प्रकार के मुक्ता फलों की मालाओं के द्वारा सौ जाति के इन्द्रों से पूजित जिनेन्द्र के पद पंकज युगल को पूजे ।
हि-दुद्ध-सपिमिस्सेहिकमल afg- विजरोहिय रूपय सुवण्ण-कैसाइथालिणिएहि विविह भक्तेहि ।
पुज्जं विस्थारिज्जो भत्तीए जिणिदयपुर श्री ।। १६६०।।
चांदी, सोना और आदि की थालियों में रते हुए दही, दूध और घी में मिले हुए नाना प्रकार के चांवलों के भात से त्रेसठ प्रकार के व्यंजनों से तथा नाना प्रकार की जाति वाले पकवानों से और विविध भक्ष्य पदार्थों से भक्ति के साथ जिनेन्द्रचरणों के सामने पूजा को विस्तारे अर्थात् नैवेध से पूजन करे ।
भत्तेहबहुप्यारेहि । बहुविकण एहिं ।। १६८९ ।।
पोहाभियक्तेहिघूमरहि एहि ।
मंदं चल मंदाणि लव से खच्चंत प्रचहि ॥१६६१॥ tree महत्व दूर मवसारियंधयारेदि ।
जिण चरणकमलपुरो कुज्जिरयां सुभप्तीए । १६६२।।
अपने प्रभा समूह से अमित ( गणित ) सूर्यो के समान तेज वाले अथवा अपने प्रभा पुञ्ज से सूर्य के तेज को भी तिरस्कृत या निराकृत करने वाले धूम-रहित तथा धीरे-धीरे चलती हुई मन्द वायु के वश से नाचती हुई शिखात्रों वाले और मेघ पटल रूप, कर्म समूह के समान दूर भगाया है, अन्धकार को जिन्होंने ऐसे दीपकों से परम भक्ति के साथ जिन चरण कमलों के प्रागे पूजन की रचना करे अर्थात् दीप से पूजन करे ।
काला रूह चंदह कप्पूर सिल्हारसाइदव्वेहिं । शिष्यख धूम वसोहि परिमलाय त्तियालीहि ।।१६६३|| उगसिहादेसिय सन्ग- मोक्ख मगेहि बहल धूमेह
धूविज्ज जिरिंदपयार विव जुयलं सुरिदणुयं ॥। १६६४।। कालागरु, अम्बर, चन्द्रक, कर्पूर, शिलारस ( शिलाजीत ) श्रादि सुगंधित द्रव्यों से बनी हुई, जिसकी सुगन्ध से लुब्ध होकर भ्रमर आ रहे हैं तथा जिसकी ऊँची