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________________ अध्याय : दसवा ] [ ८३७ कापूर-कुकुमायरू-तुरूक्कमीसेरख चंदरणरसेरण । वरबहलपरिमला मोय बासियासा समूहेस. ।।१६८२॥ वासाणु मागसंपत्त भुइय मत्तालिराव मुहलेण । सुरमउडधिटु बलरणं भत्तीएसमलहिज्जजिणं ।।१६८३॥ कपूर, कुम्कुम, अगर, तगर से मिश्रित, सर्व श्रेष्ठ विपुल परिमल (सुगन्ध) के आमोद से आशा समूह अर्थात् दशो दिशाओं को आवासित करने वाले और सुगन्धि के मार्ग के अनुकरण से आये हुए प्रमुदित एवं मत्त भ्रमरों के शब्दों से मुखरित, चंदन रस के द्वारा, (निरन्तर नमस्कार किये जाने के कारण) सुरों के मुकुटों से जिनके चरण घिस गये हैं । ऐसे श्री जिनेन्द्र को भक्ति से विलेपन करे। ससिकतखंड विमलेहि विमल अलसित्त अइसुयहि । । जिरणपडिमपइट्ठयज्जिय विशुद्ध पुष्णं कुरेहि व ॥१६८४॥ वरकमालसालितंडल नदि सुशि दोह सयलेहि । मणुय-सुरासुर महियं पुज्जिज्ज जिणि दपय जुपलं ॥१६८५॥ . चन्द्र कान्त मणि के खंड समान निर्मल तथा विमल (स्वच्छ) जल से धोये हुए और अति सुगन्धि, मानो जिन प्रतिमा की प्रतिष्ठा से उपार्जन किये गये विशुद्ध पुण्य के अंकुर हो हो, ऐसे अखंड और लंबे उत्तम कलमी और शालिघान्य से उत्पन्न तन्दुलों के समूह से मनुष्य, सुर और असुरों के द्वारा पूजित श्री जिनेन्द्र के चरण युगल को पूजे। मालइ-कयंब कणयारि-चक्यासोय-उल-तिलएहि । मंदार-णायचंपय-पउमुप्पल-सिटु वारेहिं ॥१६८६।। कणवर मल्लियाहिं कचरणार-मचकुदकिकराहि । सुरवणज जूहिया-पारिजातय-जासवरण-टगरेहि ॥१६८७॥ सोवण्ण-रूप्पि-मेहिय-मुत्तदामेहि- बहुधियध्येहि । जिरणापय-पंकय जुपलं पुजिज्जरिंच सयमाहि ॥१६५८।। मालती, कदम्ब, कर्णकार (कर), चंपक, अशोक, बकुल, तिलक, मन्दार, नाग, चम्पकपा (लाल कमल), उत्पल (नीलकमल), सिंदुबार (वृक्षविशेष या निर्गुण्डी) काबोर (कर) मल्लिका, कचनार, मचकुन्द, किकरात् (अशोक वृक्ष), देवों के नन्दन
SR No.090436
Book TitleGommat Prashnottar Chintamani
Original Sutra AuthorN/A
AuthorDigambar Jain Kunthu Vijay Granthamala Samiti Jaipur
PublisherDigambar Jain Kunthu Vijay Granthamala Samiti
Publication Year
Total Pages1124
LanguageHindi
ClassificationBook_Devnagari, Religion, & Karma
File Size37 MB
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