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काल पूजा
[ गो. प्र. चिन्तामणि
गम्भावयार-जम्भाहितेय - क्खिख खास-रिवारणं । जम्हि दिरणे संबाद जिरपण्हवणंतद्दिणो कुज्जा ॥१६७९ ॥ इच्छारस सप्पि-दहि-खीर-गंध-जलपुष्णा विविहल से हि पिसि गंगाह कायम् ॥
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दीस रविवसे तहा अण् उचियपव्वेसु । अंकोरइ जितमहिमं विष्णेया काल पूजा सा 11
जिस दिन तीर्थंकरों के गर्भावतार जन्माभिषेक, निष्क्रमण कल्याणक, ज्ञान कल्याणक और निर्वाण कल्याणक हुए हैं, उस दिन इक्षुरस, घृतं दधि, क्षीर, गंध और जल से परिपूर्ण विविध अर्थात् अनेक प्रकार के कलशों से जिन भगवान् का अभिषेक करे तथा संगीत, नाटक आदि के द्वारा जिन गुणगान करते हुए रात्रिजागरण करना चाहिये। इसी प्रकार नन्दीश्वर पर्व के दिनों में तथा अन्य भी उचित दिनों में जिन महिमा की जाती है, वह कालं पूजा है ।
भाव पूजा
परम भक्ति के साथ जिनेन्द्र भगवान के अनन्त चतुष्टय आदि गुणों का कीर्तन करके जो त्रिकाल वंदना को जाती है, उसे निश्चय से भाव पूजा जानना चाहिये । अथवा पंच णमोकार पदों के द्वारा अपनी शक्ति के अनुसार जाप अथवा स्तोत्र अर्थात् गुणगान करने को भाव पूजा जानना चाहिये । अथवा चार प्रकार का ध्यान करना भी भाव पूजा है ।
श्रष्ट द्रव्य से पूजा---
माहिऊपसिसिरकर किरपरिगयर धवलरयर्यागारं ।
मोत्ति - पवाल- मरय सुवण-मणि खचिय वरकं ।। १६८० ॥ ॥ समवत्त- कुसुम कुवलय रजविजर सुरहि-विमल - जलभरियं । विविज्जियो तिष्णिधारा ॥१६८१।।
जिणचरण कमलपुर
मोती, प्रवाल, मरकत, सुवर्ण और मणियों से जटित श्रेष्ठ कण्ठ वाले, शतपत्र (रक्त कमल ) के पराम से पिंजरित एवं सुरभित विमल जल से भरे हुए शिशिर कर ( चन्द्रमा की किरणों के समूह से भी प्रति धवल रजत (चांदी) के भुगार ( भारी ) को लेकर जिन भगवान् के चरण कमलों के समाने तीन धाराएँ छोडना चाहिए ।