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करमापासार
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अध्याय : पाठयां ।
[ ५५३ किन्तु स्कन्ध भी पुदगल हैं । निश्चयनय से परमाण ही पुद्गल हैं और व्यवहार नय से स्कन्ध भी पुद्गल हैं। स्कन्धों की उत्पत्ति का कारण
भेवसातेभ्य उत्पश्चन्ते ।।१२६३।।
स्कन्धों की उत्पत्ति भेद, संघात और दोनों से ही होती है । भेद अत्ति - विदारण जुदा होना, संधात अर्थात् मिलना इकट्ठा होना ।.
दो प्रण ओं के मिल जाने से दो प्रदेश वाला स्कन्ध बन जाता है । दो प्रदेश वाले स्कन्ध के साथ एक अरण के मिल जाने से तीन प्रदेश बाला स्कन्ध हो जाता है । इस प्रकार संघात से संख्यात, असंख्यात और अनन्त प्रदेश परिमारण स्कन्ध की उत्पत्ति होती है । भेद से भी स्कन्धों की उत्पत्ति होती है । संख्यात और अनन्त प्रदेश वाले स्कन्धों के भेद (टुकड़े) करने से द्विप्रदेश पर्यन्त अनेक स्कन्ध बन जायेंगे। इसी प्रकार भेद और संघात दोनों से भी स्कन्ध की उत्पत्ति होती है ! कुछ परमाणुओं से भेद होने से, और कुछ परमाणुओं के साथ संघात होने से स्कन्ध की उत्पत्ति होती है। अणु की उत्पत्ति का कारण
भेवादणुः ।।१२६४॥
परमाणु की उत्पत्ति भेद से ही होती है----संघात और भेदसंघात से अणु की उत्पत्ति नहीं होती है । किसी स्कन्ध के परमाणु पर्यन्त भेद करने से परमारण की की उत्पत्ति होती है। रश्य स्कन्ध की उत्पत्ति का कारण--
मेद संघासाभ्यां चाक्षुषः ॥१२६॥
चाक्षुष अर्थात् बक्षु इन्द्रिय से देखने योग्य स्कन्धों की उत्पत्ति भेद और संघात से होती है, केवल भेद से नहीं । अनंत अरण अओं का संघात होने पर भी कुछ स्कंध चाक्षुष होते हैं। और कुछ अचाक्षुष । जो अचाक्षुष स्कंध है, उसका भेदं हो जाने पर भी सूक्ष्म परिमारण बने रहने के कारण वह चाक्षुष नहीं हो सकता। लेकिन यदि उस सुक्ष्म स्कंध का भेद होकर अर्थात् सूक्ष्मत्व का विनाश होकर अन्य किसी चाक्षुष स्कंध के साथ सम्बंध हो जाय तो वह चाक्षुष हो जायेगा । इस प्रकार चाक्षुष स्कंध की उत्पत्ति भेद और संघात दोनों से होती है।
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