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________________ AANEMLENO ५५४ ] [ गो. प्र. चिन्तामरिण ... A M H . OTRAINSTATumao JILAIRLIARituenymsmosomesusew :-.. - द्रव्य का लक्षण--- सद् द्रव्य लक्षणम् ।।१२६५।। द्रव्य का लक्षण सत् है, अर्थात् जिसका अस्तित्व अथवा सत्ता हो, वह द्रव्य है। सत् का स्वरूप-- . उत्पाद व्यय प्रौव्य पुवते सत् ।।१२६६।। : जो उत्पाद, व्यय और ध्रौव्य सहित हो, वह सत् है । अपने मूल स्वभाव को न छोड़कर नवीन पर्याय की उत्पत्ति को उत्पाद कहते हैं। जैसे मिट्टी के पिण्ड से घट पर्याय का होना । पूर्व पर्याय का नाश हो जाना व्यय है । जैसे घट की उत्पत्ति होने पर मिट्टी के पिण्ड का विनाश व्यय है । ध्रौव्य, द्रव्य के उस स्वभाव का नाम है जो द्रव्य की सभी पर्यायों में रहता है और जिसका कभी विनाश नहीं होता । जैसे - मिट्टी । पर्यायों का उत्पाद-विनाश होने पर भी द्रव्य स्वभाव का अन्वय बना o nymsunnyn:. d 3DMem verma-masanmaanamerama- vasun.ammarARIRAammu-ms प्रश्न :--भेद होने पर युक्त शब्द का प्रयोग देखा जाता है । जैसे - देवदत्त दण्ड से युक्त है। इसी तरह यदि उत्पाद, व्यय, धौव्य और ध्य में भेद है; तो दोनों का प्रभाव हो जायगा, क्योंकि उत्पाद, व्यम और ध्रौव्य के बिना द्रव्य की सत्ता सिद्ध नहीं हो सकती और द्रव्य के प्रभाव में उत्पाद, व्यय और ध्रौव्य भी संभव नहीं है ? उत्तर :---उत्पाद आदि और द्रव्य में अभेद होने पर भी कथञ्चिद् भेद नय की अपेक्षा से युक्त शब्द का प्रयोग किया जाता है । यह खम्भा सार युक्त है, ऐसा व्यवहार अभेद में भी देखा जाता है। द्रव्य लक्ष्य है और उत्पाद आदि लक्षण हैं । अतः लक्ष्यलक्षण भाव को दृष्टि में रखने पर पर्यायाथिक नय की अपेक्षा से द्रव्य और उत्पाद आदि में भेद है, लेकिन द्रव्याथिक नय की अपेक्षा से उनमें अभेद है । अथवा यहां युक्त शब्द योगार्थक युज् धातु से नहीं बना है, किन्तु युक्त शब्द समाधि (एकता) वाचक है । अतः जो उत्पाद, व्यय, ध्रौव्यात्मक हो, उसका नाम द्रव्य है । तात्पर्य यह है कि उत्पाद; व्यय और घाव्य एतत्त्रयात्मक ही द्रव्य है, दोनों का पृथक् अस्तित्व नहीं है । पर एक अंश है और दूसरा अंशी, एक पर्याएँ है तो दूसरा अन्वयी द्रव्य, एक लक्षरण है, तो दूसरा लक्ष्य इत्यादि भेद दृष्टि उनमें भेद है.........
SR No.090436
Book TitleGommat Prashnottar Chintamani
Original Sutra AuthorN/A
AuthorDigambar Jain Kunthu Vijay Granthamala Samiti Jaipur
PublisherDigambar Jain Kunthu Vijay Granthamala Samiti
Publication Year
Total Pages1124
LanguageHindi
ClassificationBook_Devnagari, Religion, & Karma
File Size37 MB
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