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अध्याय : आठवां ]
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निस्य का लक्षरण---
तभावाव्ययं नित्यम् ।।१२६७।।
उस भाव या स्वरूप के प्रत्यभिज्ञान का जो हेतु होता है, वह अनुस्यूत अंश नित्यत्व है । यह वही है, इस प्रकार के ज्ञान को प्रत्यभिज्ञान कहते हैं ! यह ज्ञान बिमा हेतु के नहीं हो सकता । अतः तद्भाव प्रत्यभिज्ञान का हेतु है । किसी ने पहिले देवदत्त को बाल्यावस्था में देखा था। जब वह उसे वृद्धावस्था में देखता है और पूर्व का स्मरण कर सोचता है कि - यह तो वही देवदत्त है। इससे ज्ञात होता है कि देवदत्त में एक ऐसा तद्भाव (स्वभाव विशेष ) है जो बाल्य और वृद्ध दोनों अवस्थाओं में अन्वित रहता है । यदि द्रव्य का अत्यन्त विनाश हो जाय और सर्वथा नूतन पर्याय की उत्पत्ति हो तो स्मरण कर प्रभाव हो जायगा और स्मरणाभाव होने से लोक व्यवहार की भी निवृत्ति हो जायगी। द्रव्य में नित्यत्व द्रव्यार्थिक नय की अपेक्षा से ही है, सर्वथा नहीं । यदि द्रव्यं सर्वथा नित्य हो तो आत्मा में संसार की निवृत्ति के लिए की जाने वाली दीक्षा आदि क्रियाएँ निरर्थक हो जायेंगी । और आत्मा की मुक्ति भी नहीं हो सकेगी।
अपितानपितसिद्धः ॥१२६॥
मुख्य या प्रधान और गौरण या यप्रधान के विवक्षा भेद से एक ही द्रव्य में नित्यत्व अनित्यत्व आदि अनेक धर्म रहते हैं। वस्तु अनेक धर्मात्मक है। जिस समय जिस धर्म की विवक्षा होती है, उस समय वह धर्म प्रधान हो जाता है और अन्य धर्म गौरण हो जाते हैं । एक ही मनुष्य पिता, पुत्र, भ्राता, चाचा आदि अनेक धर्मों को धारण करता है । वह अपने पुत्र की अपेक्षा पिता है, पिता की अपेक्षा पुत्र है, भाई की अपेक्षा भ्राता है । अतः अपेक्षा भेद से एक ही वस्तु में अनेक धर्म रहने में कोई विरोध नहीं है। द्रव्य सामान्य अन्वयी अंश से नित्य है तथा विशेष पर्याय की अपेक्षा अनित्य है । इसी तरह भेद-प्रभेद, अपेक्षित्व-अनपेक्षित्व, देव-पुरुषार्थ, पुण्य-पाप आदि अनेकों विरोधी-युगल वस्तु में स्थित हैं । वस्तुतः इन सभी धर्मों का अविरोधी आधार है। परमाणुमों के बन्ध का कारण---
स्निग्ध क्षत्वाद् अन्धः ॥१२६६।। . स्निग्ध और रुक्ष मुरण के कारण परमाणुओं का परस्पर में बन्ध होता है।