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________________ [ मो. प्रः चिन्तामणि स्निाध और रुक्ष वाले दो परमाणुओं के मिलने से द्वषणुक और तीन परमाणुओं के मिलने से व्यणुक की उत्पत्ति होती है। इसी प्रकार संख्यात, असंख्यात और अनन्त परमाणु वाले स्कन्धों की भी उत्पत्ति होती है । स्निग्ध और रुक्ष गुण के एक से लेकर अनन्त तक भेद होते हैं । जैसे जल, बकरी का दूध और धृत, गाय का दूध और धत और ऊंटनी का दूध और घृत इनमें स्निग्ध गुण की उत्तरोत्तर अधिकता है । धूलि, रेत, पत्थर, वज्र प्रादि में रुक्ष गुण की उत्तरोत्तर अधिकता है । इसी प्रकार पुद्गल परमाणुओं में स्निग्ध और रुक्ष गुण का प्रकर्ष और अपकर्ष पाया जाता है । ने जघन्य गुणानाम् ॥१२७०।। जघन्य गुण वाले परमाणुओं का बन्ध नहीं होता है। प्रत्येक परमाणुओं में स्निग्ध आदि के एक से लेकर अनन्त तक गुण रहते हैं । गुरण उस अविभागी प्रतिच्छेद (शक्ति का अंश) का नाम है, जिसका दूसरा विभाग या विवेचन न किया जा सके । जिन परमाणुओं में स्निग्धता और रक्षता का एक ही तुम सा झ रहता है, उनका परस्पर बन्ध नहीं हो सकता । गुण शब्द का प्रयोग गौरा, अवयव, द्रव्य, उपकार, रूपादि, ज्ञानादि, विशेषरण, भाग आदि अनेक अर्थों में होता है। वहीं गुरुम् शब्द भाग (अविभागी अंश) अर्थ में लिया गया है। एक गुण बाले स्निग्ध परमाणु का एक, दो, तीन आदि अनन्त गुणवाले स्निग्ध या रुक्ष परमाणु के साथ बन्ध नहीं होगा। इसी प्रकार एक मुरण वाले रुक्ष परमाणु का एक, दो तीन प्रादि अनन्त गुरण वाले रुक्ष या स्निग्ध परमाणु के साथ बन्ध नहीं होगा । जघन्य मुग बाले स्निग्ध और रक्ष परमाणुओं को छोड़कर अन्य स्निग्ध और रुक्ष परमाणुओं का परस्पर में बन्ध होता है। गुगसाम्ये सदृशानाम् ।।१२७१।। गुणों की समानता होने पर एक जाति वाले परमाणुओं का भी बन्ध नहीं होता है । अर्थात् दो गुण वाले स्निग्ध परमाणु का दो मुसा वाल स्निग्ध या रक्ष परमाणु के साथ बन्ध नहीं होता है । और दो गुण वाले रुक्ष परमाणु का दो गुण वाले रुक्ष या स्निग्ध परमाणु के साथ बन्ध नहीं होता है। यञ्चापि गुण की समानता होने पर सजातीय या विजातीय किसी प्रकार के परमाणुओं का बन्ध नहीं होता है और इस प्रकार सूत्र में सदृश शब्द निरर्थक हो जाता है, लेकिन सदृश शब्द इस बात को सुचित करता है कि गुणों की विषमता होने H omen wwwNOHas
SR No.090436
Book TitleGommat Prashnottar Chintamani
Original Sutra AuthorN/A
AuthorDigambar Jain Kunthu Vijay Granthamala Samiti Jaipur
PublisherDigambar Jain Kunthu Vijay Granthamala Samiti
Publication Year
Total Pages1124
LanguageHindi
ClassificationBook_Devnagari, Religion, & Karma
File Size37 MB
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