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[ मो. प्र. चिन्तामणि पुद्गल के भेद-~
प्रणवः स्कन्धाश्च ॥१२६२॥
पुदगल द्रव्य के दो भेद हैं-अरए और स्कन्ध ! अण, का परिमारा आकाश के एक प्रदेश प्रमाण है । यद्यपि परमारण प्रत्यक्ष नहीं है, लेकिन उसका स्कन्ध रूप कार्यों को देखकर अनुमान कर लिया जाता ह ।।
परमारण प्रों में दो अबिरोधी स्पर्श, एक वर्ण, एक गन्ध और एक रस रहता है । ये स्वरूप की अपेक्षा से नित्य हैं, लेकिन स्पर्श आदि पर्यायों की अपेक्षा से अनित्य भी हैं ! इनका परिमाण परिमण्डल (गोल) होता है। नियमानुसार परमारण का स्वरूप इस प्रकार बतलाया है--
"जिसका वही प्रादि, वही मध्य, वही अन्त हो, जो इन्द्रियों से नहीं जाना जा सके, ऐसे प्रविभागी द्रव्य को परमारग कहते हैं।"
स्कन्ध-स्थूल होने के कारण जिसका ग्रहण, निक्षेपण प्रादि हो सके, ऐसे पुद्गल के परभाग अओं के समूह को स्कन्ध कहते हैं । ग्रहण आदि व्यापार की योग्यता न होने पर भी उपचार से द्वयण के प्रादि को भी स्कन्ध कहते हैं।
यद्यपि पुद्गल के अनन्त भेद हैं, लेकिन प्रण रूप जाति और स्कन्ध रूप जाति को अपेक्षा से दो भेद हो जाते हैं। प्रश्न-जाति में एकवचन होता है, फिर सूत्र में बहुवचन का प्रयोग क्यों
किया? उत्तर- अरण और स्कन्ध के अनेक भेद बतलाने के लिये बहुवचन का
प्रयोग किया गया है । यद्यपि 'अरण, स्कन्धाश्च' इस प्रकार एकपद पाले सूत्र से ही काम चल जाता है । लेकिन पूर्व के दो सूत्रों में भेद बतलाने के लिए 'अरणकः स्कन्धाश्च' इस प्रकार
दो पद का सूत्र बनाना पड़ा । 'स्पर्श रस गन्ध वरणं वन्तः पुद्गलाः' इस सूत्र का सम्बन्ध केवल अरग से है अर्थात् परमारण प्रों में स्पर्श, रस, गंध, वर्ण पाये जाते हैं । लेकिन स्कन्ध का सम्बन्ध 'स्पर्श रस' इत्यादि और 'शब्द बन्ध' इत्यादि दोनों सूत्रों से है। स्कन्ध स्पर्श, रस, गन्ध, वर्ण वाले होते हैं तथा शब्द, बन्ध आदि पर्यायवाले भी होते हैं।
इस सूत्र में 'च' शब्द समुच्चयार्थक है अर्थात् प्रण ही पुद्गल नहीं हैं
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