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________________ अध्याय : पाठवां ] स्थौल्य के भी दो भेद हैं--अन्त्य और प्रापेक्षित । अन्त्य स्थौल्य संसार व्यापी महास्कन्ध में है । बेर, आंवला, बेल आदि में प्रापेक्षित स्थौल्य है । बेर की अपेक्षा आंवला स्थल है और प्रांवले की अपेक्षा बेल स्थौल्य है। संस्थान के दो भेद है-इत्थं लक्षण और अनित्थं लक्षण । जिस प्रकार का अमुक रूप में निरुपण किया जा सके वह इत्थं लक्षण संस्थान है । जैसे गोल, त्रिकोण, चतुष्कोण मादि । जिस प्रकार के विषय में कुछ कहा न जा सके वह अनित्थं लक्षण संस्थान है, जैसे मेघ, इन्द्रधनुष आदि का आकार अनेक प्रकार का होता है । भेद छः प्रकार का है---उत्कर, चूर्ण, खण्ड, चूरिका और अणुचटन । उत्कर-करोत, कुल्हाड़ी आदि से लकड़ी प्रादि को काटना को उत्कर है। चूर्ण-जौ, गेहूँ प्रादि को पीसकर सत्तु आदि बनाना चूर्ण हैं । खण्ड---घट का फूट जाना खण्ड है । रिणका-उड़द, मूग आदि को दलकर दाल बनाना चूणिका है। प्रलर---मेघ पटलों का विघटन हो जाना प्रतर है । अणुचटन----संतप्त लोहे के गोले को धन से कूटने पर जो आगे के करण निकलते है, वह अणुचटन है । प्रकाश का विरोधी अन्धकार पुद्गल की पर्याय है। प्रकाश नौर. आवरण के निमित्त से छाया होती है । इसके दो भेद हैं-- वर्णादिविकारात्मक और प्रतिबिम्बात्मक । वर्णादिविकरात्मक छाया--गौरवर्ण को छोड़कर श्यामवर्ण, रूप, हो जाना वर्णादिविकरात्मक छाया है। प्रतिबिम्बात्मक छाया--चन्द्र प्रादि का. जल में जो प्रतिबिम्ब होता है, वह प्रतिबिम्बात्मक छाया है । श्रातप-सूर्य, बह्नि आदि में रहने वाली उष्णता. और प्रकाश का नाम उद्योत--चन्द्रमा, भरिंग, खद्योत (जुगनू) आदि से होने वाले प्रकाश को उद्योत कहते हैं। उक्त शब्दादि दश. पुद्गल द्रव्य के विकारी पर्यायें हैं। सूत्र में 'च' शब्द से अभिधात, नोदन प्रादि अन्य भी पुद्गल द्रव्य के चिकारों का ग्रहण कर लेना चाहिये।
SR No.090436
Book TitleGommat Prashnottar Chintamani
Original Sutra AuthorN/A
AuthorDigambar Jain Kunthu Vijay Granthamala Samiti Jaipur
PublisherDigambar Jain Kunthu Vijay Granthamala Samiti
Publication Year
Total Pages1124
LanguageHindi
ClassificationBook_Devnagari, Religion, & Karma
File Size37 MB
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