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[ गो. प्र. चिन्तामणि
लोकोत्तर है, और लोकोत्तम योगिराज जिनेन्द्र देव की है । भोगिराज योगिराज की विद्या, विभूति और सामर्थ्य का लेश मात्र भी प्राप्त नहीं कर सकते हैं। रेल का एक क और पर्वत कैसे दोनों समान रूप से विशाल कहे जा सकते हैं । महान तार्किक विद्वान समन्तभद्र जिनेन्द्र की प्रवृत्तियों के गम्भीर चिंतन के पश्चात् इस परिणाम पर पहुँचते हैं, कि जिनेन्द्र के कार्य प्राचित्य हैं । 'धीर ! aranमचित्यमोहितम् ।' (७४ स्वयंभू स्तोत्र ) उन्होंने धर्मनाथ जितेन्द्र के विषय में लिखा है।
मानुषी प्रकृतिमभ्यतीतवान् देवतास्वपि च देवता यतः ।
सेन नाथ परमासि देवता श्रेयसे जिनवृष प्रसीद नः ।। १६१३॥
हे धर्मनाथ जिनेन्द्र ! श्रापने निर्दोष अवस्था को प्राप्त कर मानव प्रकृति की सीमा का प्रतिक्रमण किया हैं, अर्थात् मानव समाज में पाई जाने वाली पूर्णता तथा असमर्थताओं से आप उन्मुख हैं। आप देवताओं में भी देव स्वरूप हैं, इसलिए हे स्वामिन् आप परम देवता हैं । हम पर कल्याण के हेतु प्रसन्न हों ।
योगियों की अद्भुत तपस्यात्रों के प्रसाद से जो फल रूप में सिद्धियां प्राप्त " होती हैं, उनसे समस्त विश्व विस्मय के सिंधु में डूब जाता है । समीक्षक सिद्धियों के अद्भुत परिपाक को देखकर हतबुद्धि बन जाता है । वह यदि इन जिनेन्द्रों की उत्कृष्ट रत्नत्रय धर्म की समाराधना को ध्यान में रखे, तो वह चमत्कारों को देख श्रद्धा से fara मस्तक हुए बिना न रहेगा । दीक्षा से लेकर केवलज्ञान तक महामौन स्वीकार करने वाले तीर्थङ्करों की वाणी में लोकोसर प्रभाव पाया जाना तर्क दृष्टि से पूर्ण 'संगत तथा उचित है । जब भगवान का प्रभामंडल रूप प्रांतिहार्य सहस्त्र सूर्य के तेज को जीतता हुआ समवशरण में दिन रात्रि के भेदों को दूर करता हुआ भव्य जीवों को उनके सात भव दिखाने वाले अलौकिक दर्पण का काम करता है, तो भगवान की दिव्य ध्वनि महान् चमत्कार पूर्ण प्रभाव दिखाये तो यह पूर्णतया उचित प्रतीत होता है । चन्द्र प्रभ काव्य में दिव्य ध्वनि के विषय में लिखा है।
सर्वभाषास्वभावेन ध्वनिनाथ जगदगुरुः ।
जगाद गखिन: प्रश्नादिति तत्वं जिनेश्वरः ॥१६१४।।
जगत के गुरु चन्द्रप्रभ जिनेन्द्र ने गणधर के प्रश्न पर सर्व भाषा: स्वभाव: वाली दिव्यध्वनि के द्वारा तत्वों का उपदेश दिया ।
हरिवंश पुराण में भगवान की दिव्यध्वनि को हृदय और कर्ण के लिए