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अध्याय : पाठवां ]
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रसायन लिखा है :--- 'चेतः कर्ण रसायन ।' उन्होंने यह भी लिखा है :---
जिन भाषाऽधरस्पंद मंतरेण विजुभिता । . तियादेव मनुष्याणां दृष्टिमोहमनीनशत् ।।१६१५॥
प्रोष्ठ कंपन के मिना उत्पन्न हुई जिनेन्द्र की भाषा ने तिर्यञ्च, देव तथा मनुष्यों की दृष्टि सम्बन्धी मोह को दूर किया था।
पूज्यपादस्वामी उम दिव्यध्वनि के विषय में यह कथन कहते हैं :घ्यनिरपि योजनमेकं प्रजायते श्रोन्नहृदयहारिगं भीरः । ससलिल जलधरफ्टल ध्वनितामिव विततान्तराशावलयं ॥२२॥
जिनेन्द्र भगवान की दिव्य ध्वनि श्रोत्र तथा कर्ण तथा हृदय को सुखदाई तथा गंभीर होती है। वह दिव्यध्वनि सलिल से परिपूर्ण मेध पटल की ध्वनि के समान दिगंतर में व्याप्त होती हुई एक योजन तक पहुँचती है । महापुराणकार जिनसेन स्वामी का कथन है. :--
एकतयोपि यथैव जलौघश्चिनरसो भवति ममेदात् । पात्र विशेषवशाच्च तथा सर्वविदो ध्वनिराप बहुत्वं ॥१६१६॥
जिस प्रकार एक प्रकार के पानी का प्रवाह वृक्षों के भेद से अनेक रस रूप परिणत हो जाता है, उसी प्रकार यह सर्वज्ञ देव के दिव्यध्वनि एक रूप होते हुए भी पात्रों के भेद से विविध रूपता को प्राप्त होती है। कर्नाटक की कानडी भाषा के जैन व्याकरण में यह उपयोगी श्लोक पाया है :
गंभीर मधुरं मनोहरतरं दोषव्यपेतं हित । कंठौष्ठादि वसोनिमितरहितं नो वातरोधोद्गतं ॥ स्पष्टं तत्तदभीष्टवस्तुकथकं निःशेषभाषात्मकं । दूरासन्नसमं शमं निरूपम जैन वचः पातु नः ॥१६१६॥
गम्भीर, मधुर, अत्यन्त मनोहर, निष्कलंक, कल्याणकारी, कंट, ओष्ठ, तालु आदि वचन उत्पत्ति के निमित्त कारणों से रहित, पवन के रोध बिना उत्पन्न हुई, स्पष्ट श्रोताओं के लिए अभिष्ट तत्त्वों का निरूपण करने वाली सर्व भाषा स्वरूप, सभीप तथा दूरवर्ती जीवों को समान रूप से सुनाई पड़ने वाली, शांति रस से पूरिपूर्ण तथा उपमा रहित जिनेन्द्र भगवान की दिव्य ध्वनि हमारी रक्षा करे। ,
तिलोयपण्णति में इस दिव्य ध्वनि के विषय में यह बताया है कि दिव्य
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