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[ गो. प्र. चिन्तामणि
ध्वनि १८ महाभाषा ७०० लघु भाषा तथा और भी संजी जीव जीवों की भाषा रूप परिणत होती है । यह तालु, दन्त, प्रोष्ठ और कन्ठ की क्रिया से रहित होकर एक ही समय में भव्य जीवों को उपदेश देती है !
एक्ककाल भव्यजागे दिव्यभासितं (४-६०२)
भगवान की दिव्य ध्वनि प्रारम्भ में अनक्षरात्मक होती है, इसलिए उस समय केवली भगवान के अनुभय' बचन बोम माना गया है । पश्चात् श्रोताओं के कर्ण प्रदेश को प्राप्त कर सम्यग्ज्ञान को उत्पन्न करने से केवली भगवान के सत्य वचन योग का सद्भाव भी आमम में माना है। गोम्मटसार की संस्कृत टीका में इस प्रसंग पर महत्व पूर्ण बात कही है। 'सयोगकेवलि दिव्यध्वनेः कथं सत्यानुभय वाग्योगस्वमितिचेत् तत्र तदुत्पत्तावनक्षरात्मकत्वेन श्रोत-श्रोत्र-प्रदेश प्राप्ति समय पर्यन्तमनुभयभाषात्वसिद्धेः । तदनन्तरं च श्रोतृजनाभिप्रेतार्थेषु संशयादि निराकरणेन सम्यग्ज्ञानजनकत्वेन सत्यवाग्योगत्वसिद्धेश्च तस्यापि तदुभयत्व घटनात् (गो. जी. गाथा २२७ पृ० ४८८) । प्रश्न :- सयोग केवली को दिव्यध्वनि को किस प्रकार सत्य अनुभय वचन
योग कहा है ? उत्तर :---केवली की दिव्यध्वनि उत्पन्न होते ही अनक्षरात्मक रहती है, इसलिए श्रोताओं के कर्ण प्रदेश से सम्बन्ध होने के समय तक अनुभय वचन योग सिद्ध होता है। इसके पश्चात् श्रोताओं के इष्ट अर्थों के विषय में संशय आदि को निराकरण करने से तथा सम्यग्ज्ञान को उत्पन्न होने से सत्य वचन योग का सद्भाव सिद्ध होता है। इस प्रकार केवली के सत्य और अनुभय वचन योग सिद्ध होते हैं ।
___इस कथन से ज्ञात होता है कि श्रोताओं के समीप पहुँचने के पूर्व वारणी अनक्षरात्मक रहती है, पश्चात् भिन्न-भिन्न श्रोताओं का आश्रय पाकर वह दिव्य ध्वनि अक्षर रूपता को धारण करती है। स्वामी समन्तभद्र ने जिनेन्द्र देव को वाणी को सर्वभाषा स्वभाव वाली कहा है, यथा---
तव वागमृत्तं श्रीमत्सर्वभाषास्वभावकम् । शीरणयस्यमृतं यत्पारिएनो व्यापि संसघि ॥१६१८॥
श्री सहित तथा सर्व भाषा स्वभाव वाली आपकी अमृत वाणी समवशरण में व्याप्त होकर अमृत की तरह प्राणियों को आनन्दित करती है।