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________________ अध्याय : आठवां ] . . [ ६७६ महापुराणकार दिव्यध्वनि को अक्षरात्मक कहते हुए इस प्रकार प्रतिपादित करते हैं---- देवकृतो ध्वनिरित्यसेबसन् विगुणस्य तथा विहतिः स्यात् । . साक्षर एव च वर्णसमूहान्नव विनाथगतिजति स्यात् ।।१६१६।। कोई लोग कहते हैं कि दिव्यध्वनि देवकृत है । यह कथन वास्तविक नहीं है, क्योंकि ऐसा मानने से जिनेन्द्र भगवान के अतिशय गुर्ग का व्याघात होता है। वह दिव्यध्वनि अक्षरात्मक ही है (यहां 'ही' बाचक 'एच' शब्द विशेष ध्यान देने योग्य है ) कारण अक्षरों के समूह के बिना लोक में अर्थ का बोध नहीं होता है। जयधवला टीका में जिनसेन स्वामी के गुरु बीरसेनाचार्य ने दिव्यध्वनि के विषय में ये शब्द कहे हैं-केरिसा सा (दिव्यज्झुणी) ? सव्वभासा-सरूबा, अक्खराणवखरपिया, पणन्तत्थ-गम बीजपदघडियसरीरा' (भाग १ पृ० १२६) __ वह दिव्यध्वनि किस प्रकार की हैं ? वह सर्वभाषा स्वरूप है। अक्षरात्मक अनक्षरात्मक है । अनन्त अर्थ है गर्भ में जिसके, ऐसे बोजपदों से निर्मित शरीर वाली है अर्थात् उसमें बीजपदों का समुदाय है । चौसठ ऋद्धियों के बीज बुद्धि नाम की ऋद्धि का भी कथन आता है। उसका स्वरूप राजवातिक में इस प्रकार कहा है-जसे हल के द्वारा सम्यक प्रकार से तैयार की गई उपजाऊ भूमि में योग्य काल में बोया गया एक भी बीज बहुत बीजों को उत्पन्न करता है, उसी प्रकार नो इन्द्रियावरण, श्रुतज्ञानावर तथा वीर्याऽन्त राय कर्म के क्षयोपशम के प्रकर्ष से एक बीज पद के ज्ञान द्वारा अनेक पदार्थों को जानने की बुद्धि को बीजबुद्धि कहते हैं--'सुकृष्ट सुमथिते क्षेत्रे सारवति कालादिसहायापेक्ष बीजमेकमुप्तं यथानेकबीजकोटिप्रदं भवति तथा नोइन्द्रियावरण-श्रुतावरण, बीर्यान्तराय क्षयोपशम प्रकर्षे सति एक बीजपद ग्रहणादनेक पदार्थ प्रतिपत्ति/जबुद्धि.' . (रा. वा० अध्याय ३ सूत्र ६६ पृ० १४३) इस सम्बन्ध में यह कहा जाता है कि जिनेन्द्रदेव की बीजपदयुक्त वाणी को गणधर देव. बीजबुद्धि ऋद्धिधारी होने से अवधारण करके द्वादशांग रूप रचना करते हैं। ___ इस प्रसंग में यह बात विचार योग्य है कि प्रारम्भ में भगवान की वाणी को झेलकर गराधर देव द्वादशांग की रचना करते हैं, अतः उस वासी में बीजपदों का
SR No.090436
Book TitleGommat Prashnottar Chintamani
Original Sutra AuthorN/A
AuthorDigambar Jain Kunthu Vijay Granthamala Samiti Jaipur
PublisherDigambar Jain Kunthu Vijay Granthamala Samiti
Publication Year
Total Pages1124
LanguageHindi
ClassificationBook_Devnagari, Religion, & Karma
File Size37 MB
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