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[ गो. प्र. चिन्तामरिण समावेश आवश्यक है, जिनके श्राश्रय से चार ज्ञान धारी महर्षि गरधर देव अंगपूर्वो की रचना करने में समर्थ होते हैं । वीर भगवान की दिव्यध्वनि को गौतमगरावर देव सुनकर 'बारहगाणं चोट्स पुण्वारणं च गंथारणमेवकरण चैव मुहुतेरा कमेारयणा कदा' (धवला. टीका - भाग १ सु. ६५) द्वादशांग तथा चौदहपूर्व रूप ग्रन्थों की एक मुहुर्त में क्रम से रचना की ।
इसके पश्चात् भी तो महावीर भगवान की दिव्यध्वनि खिरती रही है । श्रोतृमण्डली को गणधर देव द्वारा दिव्यध्वनि के समय के पश्चात् उपदेश प्राप्त होता है । जब दिव्यध्वनि खिरती है, तब मनुष्यों के सिवाय सज्ञी पंचेन्द्रिय तिर्यञ्च देवादि भी अपनी-अपनी भाषाओं मे अर्थ को समझते हैं। इससे वीरसेन स्वामी ने उस दिव्य वाणी को 'सव्वभाषा सरुवा' सर्वभाषा स्वरूपा भी कहा है । उस दिव्यवाणी की यह ratheir है कि उस दिवाणी से गएर देव सतु महानुभाव ज्ञान के सिन्धु भी अपने लिये अमूल्यज्ञान निधि प्राप्त करते हैं । तथा महान मंदमति प्राणी, सर्प, गाय, व्यान्त्र, कपोत, हंसादि पशु-पक्षी भी अपने-अपने योग्य ज्ञान की सामग्री प्राप्त करते हैं । उपरोक्त समस्त कथन पर गम्भीर विचार तथा समन्वयात्मक दृष्टि डालने पर प्रतीत होता है कि जिनेन्द्र देव की दिव्यध्वनि अलोकिक वस्तु है, अनुपम है और आश्चर्य-प्रद है । उस वाणी के समान विश्व में अन्य कोई वाणी नहीं है । वाणी की लोकोत्तरता में कारण तीर्थंकर भगवान की त्रिभुवन वंदित अनन्त सामर्थ्य समलंकृत व्यक्तित्व है । श्रेष्ठ सामर्थ्यधारी गणधर देव, महान महिभाशाली सुरेन्द्र आदि भी प्रभु की अपूर्व शक्ति से प्रभावित होते हैं। योग के द्वारा जो चमत्कार युक्त वैभव दिखाई पड़ता है, वह स्थूलदृष्टि वालों की समझ में नहीं पाता है, अतएव वे विस्मय के सागर में डूबे ही रहते है । दिव्यध्वनि तीर्थंकर प्रकृति के विपाक - उदय की सबसे महत्वपूर्ण वस्तु है, क्योंकि तीर्थंकर प्रकृति कर्म का बंध करते समय केवली, श्रुत'केवली के पादमूल में इसी भावना का बीज बोया गया था कि इस बीज से ऐसा वृक्ष बने, जो समस्त प्राणियों को सच्ची शांति तथा मुक्ति का मंगल संदेश प्रदान कर सके। मनुष्य पर्याय रूपी भूमि में बोया गया यह तीर्थंकर प्रकृति रूप बीज अन्य साधन सामग्री पाकर केवली की अवस्था में अपना वैभव तथा परिपूर्ण विकास दिखाता हुआ त्रैलोक्य के समस्त जीवों को विस्मय में डालता है । आज भगवान ने