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________________ अध्याय : माठवा ] [ ६८१ इच्छा का भाव कर दिया है, फिर भी उनके उपदेश प्रादि कार्य ऐसे लगते हैं, मानों वे इच्छाओं द्वारा प्रेरित हों। इसका यथार्थ में समाधान यह है कि पूर्व की इच्छाओं के प्रसाद से भी कार्य होता है । जैसे घड़ी में चाबी भरने के पश्चात् वह घड़ी अपने आप चलती है, उसी प्रकार तीर्थंकर प्रकृति का बन्ध करते समय जिन कल्याणकारी भावों का संग्रह किया गया था, वे ही बीज अनन्तगुणित होकर विकास को प्राप्त हुये हैं । ग्रतः केवली की अवस्था पूर्व संचित पवित्र भावना के अनुसार सब जीवों को कल्याणकारी, सामग्री प्राप्त होती हैं। दिव्यध्वनि के विषय में कुन्दकुन्दाचार्य के सूत्रात्मक ये शब्द बड़े महत्वपूर्ण प्रतीत होते हैं- तिहुव-हिद-मधुर-विसद-वक्काणं' अर्थात् दिव्यध्वनि के द्वारा त्रिभुवन समस्त भव्य जीवों को हितकारी, प्रिय तथा स्पष्ट उपदेश प्राप्त होता है । जब छास्थ तथा बाल अवस्था वाले महावीर प्रभु के उपदेश के बिना ही दो चारण ऋद्धिवारी महामुनियों की सूक्ष्म शंका दूर हुई थी तब केवलज्ञान, केवल दर्शनादि सामग्री संयुक्त तीर्थंकर प्रकृति के पूर्ण विपाक उदय होने पर उस दिव्यध्वनि के द्वारा समस्त जीवों को उनकी भाषाओं में हो जाता है, यह बात तनिक भी शंका योग्य नहीं दिखती है । इस दिव्यध्वनि के विषय में धर्मशर्माभ्युदय का यह पद्य बड़ा मधुर तथा भावपूर्ण प्रतीत होता है सर्वासमोसृष्टिः सुधावृष्टिश्च करण्योः । प्रावर्तत ततो वारणी सर्वविश्च श्वराद्विभोः ।। १६२० ॥ सर्व विद्याओं के ईश्वर जिनेन्द्र भगवान के सर्व प्रकार के आश्वयों की जननी तथा कर्णों के लिए सुधा की वृष्टि के समान दिव्य ध्वनि उत्पन्न हुई । गोम्मटसार itaris की संस्कृत टीका में लिखा है कि तीर्थंकर की दिव्यध्वनि प्रभात, मध्याह सायंकाल तथा मध्यरात्रि के समय छह-छह घटिका काल पर्यन्त अर्थात् दो घण्टा atara fafters प्रतिदिन नियम से खिरती है । इसके सिवाय गणधर चक्रवर्ती, . इन्द्र सदृश विशेष पुण्यशाली व्यक्तियों के आगमन होने पर उनके प्रश्नों के उत्तर के लिए भी दिव्यध्वनि खिरती है । इसका कारण यह है कि उन विशिष्ट पुण्याधिकारियों के संदेह दूर होने पर धर्म भावना बढ़ेगी और उससे मोक्षमार्ग की देशना का प्रचार होगा जो धर्म तीर्थंकर की तत्य प्रतिपादन की पूर्ति स्वरूप होगी । जीवकांड की
SR No.090436
Book TitleGommat Prashnottar Chintamani
Original Sutra AuthorN/A
AuthorDigambar Jain Kunthu Vijay Granthamala Samiti Jaipur
PublisherDigambar Jain Kunthu Vijay Granthamala Samiti
Publication Year
Total Pages1124
LanguageHindi
ClassificationBook_Devnagari, Religion, & Karma
File Size37 MB
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