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________________ AaraaraamananesewictiNamratarangmarwaryan CONTERMEENUEDICINE ६८२ ] [ गो. प्र. चिन्तामणि संस्कृत टीका में ये शब्द पाए हैं----'पातिकर्मक्षयानन्तर केवलज्ञान सहोत्पन्नतीर्श करत्व पुण्यातिशय विजृ भितमहिम्नः तीर्थंकरस्य पूर्वाह्न मध्याह्नापरलार्धरात्रिषु षट् षट्यटिकाकालपर्यन्त द्वादशगण सभामध्ये स्वभावतो दिव्यध्वनिरुद्गच्छति । एवं समुद्भूतो दिव्यध्वनिः समस्तासन्नश्रेतृगणानुद्दिश्य उत्तमक्षमादिलक्षणं रत्नत्रयात्मक वा धर्म कथयति' (पृष्ठ-७६१) जय धवला टीका में लिखा है कि यह दिव्यध्वनि प्रातः, मध्यान्ह तथा सायंकाल इन तीन गायों में छह-छह घड़ी पर्यन्त खिरती है-तिसंज्झै विसयछचडियासु गिरतरं पयट्टमारिणया' (भाग १ पृष्ठ-१२६) . तिलोयपण्णति में तीन संध्याओं में नवमुहूर्त पर्यन्त दिव्यध्वनि खिरने का उल्लेख है। कहा भी है-- पगदीए अक्खलियो संझत्तिदम्मि रणवमुहतारिण। गिस्सरदि रिणस्यमाणो दिव्यज्भुणी जाय जोयणयं ॥१६२१॥ लिलोयपण्यत्ति में यह भी कहा है कि 'गरपधर इन्द्र तथा चक्रवर्ती के प्रश्नानुरूप अर्थ के निरुपरणार्थ यह दिव्यध्वनि समयों में भी निकलती है, यह भध्य जीवों को छह द्रव्य, नौ पदार्थ, पांच अस्तिकाय और सात तत्वों का नाना प्रकार के हेतुओं द्वारा निरुपण करती है। प्रश्न--(गोम्मटसार में) मध्यरात्रि को दिव्यध्वनि खिरने पर यह शंका की जा सकती है कि मध्यरात्रि को जोध निद्रा के वशीभूत रहते हैं । उस समय दिव्यध्वनि के खिरने से क्या उपयोग होगा ? उत्तर--समवशरण में भगवान के प्रभामण्डल के प्रभाव से दिन और रात्रि का भेद नहीं रहता है. ! समवशरण में जाने वालों को निद्रा आदि की पीडायें भी नहीं होती हैं। अनन्त सुख का स्वरूप-त्रिलोक सार में लिखा है कि मोहनीयादि चार धातिया कर्मों के क्षय से अनन्त चतुष्टय अर्थात् अनन्त दर्शन, अनन्त ज्ञान, अनन्त सुख और अनन्तवीर्य ये चार गुरण उत्पन्न होते हैं । यह भी लिखा है 'भोग्येश्वर्थेष्वनौत्सुक्यमन्तसुखतामता' अर्थात् भोगने योग्य पदाथों में उत्सुकता का प्रभाव रहना इसको अनन्त सुख कहा है। तीर्थङ्करों के १८ दोष नहीं रहते हैं-- १८ दोषों के नाम--- १. क्षुधा (भूख), w i ....... 2uRIKAAREE-LAL. n
SR No.090436
Book TitleGommat Prashnottar Chintamani
Original Sutra AuthorN/A
AuthorDigambar Jain Kunthu Vijay Granthamala Samiti Jaipur
PublisherDigambar Jain Kunthu Vijay Granthamala Samiti
Publication Year
Total Pages1124
LanguageHindi
ClassificationBook_Devnagari, Religion, & Karma
File Size37 MB
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