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________________ अध्याय : पाठवा ] [ ६८३ २. तृषा (प्यास), ३. जन्म, ४. जरा (बुढ़ापा), ५. मरण, ६. विस्मय (आश्चर्य), ७. अरति, (पीड़ा) ८. खेद, (दुःख), ६. शोक, १०. रोग, ११. मद, गर्व) १२. मोह, १३. राग, १४. दुष, १५. भय, १६. निद्रा, १७. चिन्ता, १६. स्वेद (पसीना) । ये अठारह दोष केवली भगवान के नहीं होते हैं। प्रश्न-ऋषभदेव के केवल ज्ञान का उद्यान कौन सा था ? उत्तर--भगवान ऋषभदेव और केवल ज्ञान का उद्यान-भगवान ऋषभदेव एक हजार वर्ष तक घोर तपस्या करके एक दिन 'पुरिमतालपुर' पहुँचे। जिसका वर्तमान नाम 'प्रयाग' या 'इलाहाबाद' है । उस नगर के समीपवर्ती 'शकट उद्यान में ऋषभदेव ने वटवृक्ष के नीचे ध्यानस्थ होकर केवलज्ञान प्राप्त किया था। भगवान ऋषभदेव को जिस वटवृक्ष के नीचे अक्षय बोधि का लाभ हुआ था, या इश्वरीय रूप प्राप्त हुआ था उसी दिन से उस वटवृक्ष का नाम अक्षयवट' संसार में प्रसिद्ध हो गया है। केवलज्ञान प्राप्त होने पर समवशरण की रचना कुबेर द्वारा की गई थी। सब इन्द्र अपने परिवार के साथ ज्ञान कल्याणक पूजा के लिए वहां आये थे । और पुरिमतालपुर में इन्द्र ने भगवान ऋषभदेव की पूजा की थी। भगवान ऋषभनाथ की सर्वप्रथम धर्म देशना 'पुरिमतालपुर' में हुई थी ।. बहुत संभव है कि तभी से इस पुरिमतलापुर का नाम 'प्रयाग' हो गया है। याग नाम पूजा का है और सबसे बड़ी पूजा इन्द्र के द्वारा की जाती है जिसका नाम 'इन्द्रध्वज पूजा' है। . प्रयाग को इलाहाबाद भी कहते हैं । इलाह शब्द का अर्थ देवता ! अथवा पूजा करने लायक ऐसा होता है, इससे सम्भव है कि इसी पूजा के निमित्त से प्रयाग को इलाहाबाद भी कहते होंगे। प्रश्न--समवशरण में मानस्तंभादिकों की उंचाई का क्या प्रमाण है ? उत्तर-समवसरण में मानस्तंभादिकों की ऊंचाई-जो मानस्तंभ, ध्वजास्तंभ, चैत्यवृक्ष, सिद्धार्थ वृक्ष, स्तूप, तोरण, कोट, गृह वनवेदिका आदि रहते हैं उनकी ___ऊंचाई तीर्थंकरो के शरीर से बारह गुणी होती हैं। प्रश्न- केवली कितने प्रकार के होते हैं ? उत्तर--केवली भगवान सामान्यता से दो प्रकार के होते हैं । एक तीर्थकर केवली और दूसरे सामान्य केवली । उनमें तीर्थंकर केवलियों में पञ्चकल्याणक तीर्था ANNEL ESARSODE G
SR No.090436
Book TitleGommat Prashnottar Chintamani
Original Sutra AuthorN/A
AuthorDigambar Jain Kunthu Vijay Granthamala Samiti Jaipur
PublisherDigambar Jain Kunthu Vijay Granthamala Samiti
Publication Year
Total Pages1124
LanguageHindi
ClassificationBook_Devnagari, Religion, & Karma
File Size37 MB
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