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________________ ६८४ ] [ गो. प्र. चिन्तामणि कर केवली, तीन कल्याणक तीर्थकर केवली, और दो कल्याणक तीर्थकर केवली आदि भेद. पाये जाते हैं । और सामान्य केवलियों के भी उपसर्ग केवली, अन्तःकृत केवली, मूक केवली, अनुबन्ध केवली या. अनुबद्ध केवली इत्यादि भेद होते हैं। तीर्थकर केवली और अन्य सामान्य केवली में अंतर-- . . केवलज्ञानादि गुणों की अपेक्षा तीर्थकर केवली तथा अन्य सामान्य केवलियों में कोई अन्तर नहीं है । तथापि जिन्होंने धातिया कर्मों का क्षय कर केवलज्ञान प्राप्त किया है, वे सामान्य रूप से केवली. भगवान कहे जाते हैं। और जिन्होंने पहिले तीर्थाकर नाम कर्म प्रकृति बंध किया हो और केवलज्ञान प्राप्त किया जाता है तो वे तीर्थकर केवली भगवान कहे जाते हैं। तीर्थंकरों कि अलौकिकता--- . तीर्थकर केवलियों की विशेष अलौकिकता है-तीर्थकर और सामान्य केवली इन दोनों में जो कुछ अंतर है वह निम्न प्रकार समझना चाहिथ । ... तीर्थकर केबली भगवान के तीर्थंकर प्रकृति रूप विशेष पुण्य के उदय से उनकी इन्द्रादिक पंचकल्याणादि के रूप में विशेष भक्ति करते हैं और बाह्य में जिनके उत्कृष्ट समवशरणादि रचना रूप वैभव पाया जाता है ऐसी बातें सामान्य केवलियों में नहीं होकर केवल गंधकुटी की रचना होती है। तीर्थकर केवली भगवान के समान सामान्य केवली भगवान की दिव्य ध्वनि से जीवों को शान्ति भी मिलती है। तत्वों का ज्ञान भी प्राप्त होता है । इस प्रकार दोनों के धर्मोपदेशादि की समानता के होते हुये भी उनमें महत्वपूर्ण यह अन्तर है कि तीर्थंकरों का तीर्थप्रवर्तन काल चलता है। एक तीर्थंकर के मोक्ष होने के पश्चात् जब । तक दूसरे तीर्थंकर उत्पन्न नहीं होते, तब तक उन मोक्ष प्राप्त तीर्थंकर का तीर्थ ।। प्रवर्तन काल माना जाता है । सामात्य केवली में ऐसी बात नहीं होती है। इस अवपिणी काल में ऋषभादि वर्धमान तक केवल चौबीस तीर्थकर हुये हैं, किन्तु इन एक-एक तीर्थकाल में प्रसंख्य भव्य जीवों ने केवली होकर मोक्ष पद प्राप्त किया है । तीर्थंकरों की यही अल्पसंच्या उनकी अलौकिकता को सम्यक प्रकार से स्पष्ट कर देती है। पांच कल्याणकों के धारी तीर्थंकर--- पंच कल्याणक तीर्थीकर केवली-भरत, ऐरावत और विदेह क्षेत्र में पांच मेह
SR No.090436
Book TitleGommat Prashnottar Chintamani
Original Sutra AuthorN/A
AuthorDigambar Jain Kunthu Vijay Granthamala Samiti Jaipur
PublisherDigambar Jain Kunthu Vijay Granthamala Samiti
Publication Year
Total Pages1124
LanguageHindi
ClassificationBook_Devnagari, Religion, & Karma
File Size37 MB
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