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अध्याय आठवां ]
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सम्बन्धी १७० कर्म भूमियों में होते हैं । भरत, ऐरावत क्षेत्र में चतुर्थ काल ( अवसfret के दुषमसुषमकाल ) में होते हैं । और उत्सर्पिणी के तृतीय काल ( दुषमसुषम काल ) में होते है । विदेह क्षेत्र में सदैव होते रहते हैं । विदेह क्षेत्र की अपेक्षा जिसने पहले भव में तीर्थंकर प्रकृति का बंध किया है वही पंच कल्याणं तीर्थंकर कहलाता है। तीन अथवा दो कल्याणक केवली
तीन और दो कल्याणक तीर्थंकर केवली -पूर्व अपर (पश्चिम) दोनों विदेह क्षेत्रों में पंचमेरु सम्बन्धी १६० विदेह क्षेत्रों में होते हैं । जिन्होंने गृहस्थ अवस्था में रहते हुये तीर्थंकर प्रकृति का बंद कर लिया है उनके कल और मोक्ष ये तीन कल्याणक होते हैं और जिन्होंने मुनि होकर तीर्थंकर प्रकृति का बंध कर लिया है, उनके ज्ञान और मोक्ष ये दो कल्याणक होते हैं ।
उपसर्ग केवली -- जिनके उपसर्ग अवस्था में केवलज्ञान हो उनको 'उपसर्ग केवली' कहते हैं । जैसे श्री पार्श्वनाथ भगवान । हुन्डोवसर्पिणी काल के सिवाय अन्य काल के तीर्थंकरों के उपसर्ग नहीं कहे गये हैं ।
अन्तःकृत केवली -
अन्तः कृत केवली - जो केवलज्ञान के उत्पन्न होते ही लघु धन्तमुहूर्त में मोक्ष प्राप्त करते हैं, उनको 'अन्तःकृत केवली' कहते हैं । जैसे पांडयादि । जिस प्रकार नेमिनाथ तीर्थंकर के तीर्थकाल में कुमार भ्रमण गजकुमार घोर उपसर्ग को सहन करते हुये अन्तःकृत केवली हुये हैं, इसी प्रकार चौबीस तीर्थकरों के तीर्थकाल में दस-दस अन्तः कृत केवली हुए हैं। इनका वर्णन द्वादशांग वाणी के आठवें अंग हुआ है, उसका नाम है अन्तःकृत दशांग | श्री वर्धमान भगवान के तीर्थंकाल में होने वाले तथा अत्यन्त arer उपसर्गों को जीत कर सम्पूर्ण कर्मों का क्षय करने वाले दस मन्तः कृत केवलियों इस प्रकार नाम कहे हैं ---
नमि, पतंग, सोमिल, रामपुत्र, सुदर्शन, यसकील, बलोक, किस्किबल, मालम्ब तथा अष्टपुत्र । इस प्रकार तत्वार्थ राजवार्तिक पृष्ठ ५१. में और धवला भाग १६-१०३ में लिखा है । हरिवंश पुराण में कहा कि
दह्यमानशvisit शुक्लध्यानेन कर्मणाम् । अंतःकृत्or at मोक्षमन्तः कृत्केवली मुनिः ॥ १६२२||