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________________ ६८६ ] [ गो. प्र. चिन्तामणि मूक केवली मूक केवली--कोई-कोई केवली भगवान उपदेश नहीं देते हैं अर्थात् जिनकी वारणी (दिव्य ध्वनी)नहीं खिरती है, उनको 'मूक केवली' कहते हैं । लाटा संहिता सर्ग १ में कहा है कि लूक गल्ली रात कृष् केवली की वारणी नहीं खिरती है । अनुबन्ध या अनुबद्ध केवली-- . अनुबन्ध या अनुबद्ध केवली-श्री महावीर भगवान के मोक्ष होने के पश्चात् गौतम स्वामी ने केवल ज्ञान प्राप्त किया। उनका मोक्ष होने पर सुधर्मा स्वामी ने केवलज्ञान प्राप्त किया पश्चात् जम्बू स्वामी केवली हुए । इस प्रकार परिपाटी क्रम से केवलज्ञान प्राप्त करने वालों को अनुबंध या अनुबद्ध केवली कहते हैं । इस दृष्टि से जम्बू' स्वामी को अन्तिम केवली कहा गया है। यदि यह परिपाटी क्रम दृष्टि में न रखा जाय तो कुन्डलगिरि से अंत में मोक्ष प्राप्त करने वाले श्री धर केवली को अन्तिम केवली तथा मुक्ति प्राप्त करने वाला कहा गया है (देखो तिलोयपण्णति, पृष्ठ ३३८) तीर्थकर केवली और सामान्य केवलियों में अन्तर-- तीर्थकर केवली और सामान्य केबलियों के गुण विचार-~पंच कल्याणक तोर्थकर केवली भगवान में १० जन्मातिशय, १० केवल ज्ञान के अतिशय, १४ देवकृत अतिशय, ८ प्रतिहार्य तथा ४ अनंत चतुष्टय इस प्रकार ४६ अतिशय गुण होते हैं । इनको 'जिनगुण' ऐसा भी कहते हैं । . कोई-कोई कहते हैं सामान्य केवली के दश जन्मातिशयों को छोड़कर शेष ३६ गुरणं मानना चाहिये । परन्तु सामान्य केवली में अनन्त चतुष्टय का सद्भाव तो नियम से मानना होगा। केवल ज्ञान के दस प्रतिष्पयों में से गगनगमन, चारों दिशाओं में मुखों का दर्शन होना, उपसर्ग का अभाव, कवलाहार का प्रभाव, सर्व विद्याओं का स्वामीपना, नख तथा केशों का नहीं बढ़ना, आदि गुणों का सद्भाव मानना आवश्यक है। इस विषय में पागम का खुलासा वर्णन देखने में नहीं पाया है। किन्तु युक्ति तथा विचार द्वारा इस सम्बन्ध में चिन्तन के लिये पर्याप्त क्षेत्र है। जन्म के जो दस प्रति. शय तीर्थकर भगवान के माने गए हैं. उनमें से केवली की अवस्था में सुगन्धित शरीर का होना, पसीना रहितः होना मलमूत्र का न होना, प्रिय हित मित वाणी का सद्भाव SAASwaonentra
SR No.090436
Book TitleGommat Prashnottar Chintamani
Original Sutra AuthorN/A
AuthorDigambar Jain Kunthu Vijay Granthamala Samiti Jaipur
PublisherDigambar Jain Kunthu Vijay Granthamala Samiti
Publication Year
Total Pages1124
LanguageHindi
ClassificationBook_Devnagari, Religion, & Karma
File Size37 MB
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