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अध्याय : आठवां ।
[ ६८७ होना, अतुल बल का सद्भाव होना, रक्त का धवल वर्ण का होना, वज्रमय शरीर होना, इन अतिशयों को मानना अविरोधी दिखता है। जिसके समचतुरस्त्र संस्थान न हो वह भी केवली बन सकता है तथा उसके शरीर में १००८ लक्षणों का सद्भाव नहीं होगा, अतः सातिशय रूपता का प्रभाव भी संभवनीय हो सकता है। इससे जन्म के . सभी अतिशयों का प्रभाव कह देना ठीक नहीं जंचता है। क्योंकि बाहुबली, हनुमान, प्रद्युम्न, जीवन्धर जम्बू स्वामी आदि कामदेवों के सदृश केवली के सातिशय रूपता का सद्भाव स्वीकार करने पर उनके एक गुण की और वृद्धि अन्यों की अपेक्षा मानना उचित होगा । इस प्रकार सामान्य केवली के ३६ ही गुरा मानना उचित नहीं प्रतीत होता है, जैसा कि पूर्व में विवेचन किया जा चुका है।
तीर्थकर केबली और सामान्य केवली इन दोनों के तो 'अनन्त चतुष्टय' और 'अष्ट प्रातिहार्य' रहते हैं। बाकी के गुणों का सामान्य केलवी में नियम नहीं है, के यथायोग्य जानना चहिये। सामान्य केवली भगवान की गंधकुटी में मानस्तंभ रहते हैं या नहीं
___ जैसे तीर्थंकर केवली के समवशरण में मानस्तंभ रहते हैं, उसी तरह सामान्य केवलियों की गंधकुटी में भी मानस्तंभ रहते हैं। सुदर्शन चरित्र में लिखा है कि कुबेर द्वारा सूवर्ण रत्नादिक से युक्त जब गंध कुटी बनकर तैयार हुई थी। उसमें सिंहासन, छत्र, चमर, ध्वजादि सब शास्त्रोक्त रचना की थी इसी तरह वहां गंध कुटी मानस्तम्भों से सुशोभित की गई थी ! इत्यादि वर्णन सुदर्शन चरित्र में आया है। सामान्य केलियों को गंधकुटी में गरधर
सुदर्शन चारित्र में लिखा हैविथ्येन ध्वनिता देवस्तवा सन्मार्गवृत्तये । धर्म तत्वादि विश्वार्थानुवाचेति गणान् प्रति ।।१६२३॥
सामान्य केवलियों के भी गणधर रहते हैं। गरणधरों के अभाव में दिव्यध्वनि नहीं खिरती है। इसलिये तीर्थंकर केवली के समान सामान्य केवलियों के भी गणधर
भगवान सुदर्शन केवली ने मोक्ष मार्ग की प्रवृत्ति बढ़ाने के लिये गणधरों के द्वारा धर्म तथा समस्त तत्व का स्वरूप बता दिया था ।