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अध्याय: श्राठयां ]
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नाम आता है । समशरण में जिस वाणी को सुनकर भव्य जीव अपनी भव बाधा को दुर करने योग्य बोध प्राप्त करते हैं, वह वासी जितेन्द्र देव द्वारा उद्भूत हुई है, और मागध देवों के सहयोग से भव्यों के समीप पहुँची है। जब उस वाणी की श्रोताओं को उपलब्धि द्विविध कारणों से होती है, तब द्वितीय कारण को उस कार्य का श्राधां श्रेय स्थूल दृष्टि से दिया जाना अनुचित प्रतीत नहीं होता ।
प्रश्न : --- कोई-कोई यह सोचते हैं कि राजगिरि नगर जिस प्रान्त की राजधानी थी । उस देश की भाषा के अधिक शब्द भगवान को दिoraft में रहे होंगे प्रथा भगवान प्राकृत भाषा के उपदेश रूप अर्धमागधी नाम की भाषा में बोलते होंगे ? उत्तर :-- -लोक रूचि के परितोष के लिए उपरोक्त समाधान देते हुये कोईकोई विद्वान देखे जाते हैं, किन्तु आगम की पृष्ठ भूमि उक्त समाधान को आश्रय नहीं देती है । सूक्ष्म तथा अतीन्द्रिय विषयों पर साधिकार एवं निर्दोष प्रकाश डालने की क्षमता सम्पन्न श्रागम कहता है कि भगवान को वाणी किसी एक भाषा में सीमित नहीं होती है । सर्व विद्या के ईश्वर सर्वत्र एक ही भाषा का उपयोग करेंगे और अन्य देश तथा अन्य प्रान्त की बहुसंख्यक जनता के कल्याणार्थ अपनी पूर्व प्रयुक्त भाषा में परिवर्तन नहीं करेंगे । यह बात अन्तःकरण को अनुकूल प्रतीत नहीं होती है । उदाहरणार्थ, भगवान जब राजगृह के समीप विपुलाचल पर विराजमान थे। तब मरा देश की मागधी भाषा में विशेष जन के कल्याण को लक्ष्य कर उपदेश देना उचित तथा ग्रावश्यक प्रतीत होता है. किन्तु म्हैसूर प्रान्त में भव्य जीवों के पुण्य से पहुँचने वाले परम पिता जिनेन्द्र देव यदि कानड़ी भाषा का आश्रय लेकर तत्व निरूपण करें तो अधिक उचित बात होगी। जिनेन्द्र देव की सम्पूर्ण बातें उचित और निर्दोष ही होती हैं। ऐसी स्थिति में सर्वत्र सर्वदा मागधी नाम की मग प्रांत विशेष की भाषा में प्रभु का उपदेश होता है, यह मान्यता सुदृढ तर्क पर आश्रित नहीं दिखती है ।
महान तपश्चर्या, विशुद्ध सम्यग्दर्शन, परमंयथास्यात चारित्र, केवल ज्ञान यादि श्रेष्ठ सामग्री का सन्निधान प्राप्तकर समुद्भूत होने वाली सम्पूर्ण जीवों को शाश्वतिक शान्तिदायिनी भगवद् वारणी की सामान्य संसारी प्राणियों की भाषा से तुलनाकर दोनों को समान समझने का प्रयत्न सफल नहीं हो सकता है । वह वाणी