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[ गो. प्र. चिन्तामणि
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मागधी, भावन्तिका, प्राच्या, शौरशैनी. अर्धमागधी, बाहीकी तथा दाक्षिणात्या इस तरह सात प्रकार की प्राकृत भाषायें है । इसमें एक अर्धमागधी भाषा है ।
__ तीर्थकरों की दिव्यध्वनि मगध नाम के व्यन्तर देवों के तिमित से सर्व जीवों को भली प्रकार सुनाई पड़ती थी । प्राचार्य पूज्यपाद द्वारा रचित नन्दीश्वर भक्ति में इस अर्धमागधी भाषा का नाम सार्वार्धमागधी लिखा है 'सर्वार्धमागधी या भाषा' (५) टीकाकार आचार्य प्रभाचन्द्र ने लिखा है, सर्वेभ्यो हितसार्वा । सा चासौ अर्धमागधीया च ।' सबके लिये हितकारी को सार्व कहते हैं । सार्व तथा जो अर्धमागधी भाषा थी, उसका नाम सर्वार्धमागधी होगा। पूज्यवाद स्वामी ने सर्व के स्थान पर सार्व शब्द को ग्रहण कर यह अर्थ सूचित किया है कि भगवान की वाणी सम्पूर्ण जीवों के लिए हितकारिणी थी। प्रश्न :- जब दिव्यध्वनि को भगवान के अष्ट प्रातिहार्यों में गिना है, तब
उस जिनेन्द्र वाणी को सर्धिमागधी भाषा का नाम देवोपनीत
अतिवादों में गिनने का क्या प्रयोजन है ? उसर :--मगधदेव के सन्निधान होने पर जिनेन्द्र की वाणी को सम्पूर्ण जीव भली प्रकार ग्रहण करने में तथा उससे लाभ उठाने में समर्थ हो जाते हैं । आज वक्ता की वाणी को ध्वनि वाहक (लाउडस्पीकर) यंत्र द्वारा दुरवर्ती श्रोताओं के कानों के पास पहुंचाया जाता है । उस यत्र की सहायता से वाणी समीप में अधिक उच्च स्वर से श्रवण गोचर होती है । और कहीं उसका स्वर मन्द होता है । परन्तु जिनेन्द्र की ध्वनि प्रतीत होता है, कि मगध देवों के सानिधान से सभी जीवों को समान रूप से पूर्ण स्पष्ट और अत्यन्त मधुर सुनाई पड़ती है। जिनेन्द्र देव से उत्पन्न दिव्य ध्वनि रूपी जलराशि को मगध देव रूपी सहायकों के द्वारा भिन्न-भिन्न जीवों के कर प्रदेश के समीप सरलतापूर्वक पहुंचाया जाता है । जैसे सरोवर का जल नल के माध्यम से जनता के समीप जाता है और जनता उसे नल का पानी यह नाम प्रदान करती है । प्रतीत होता है कि भगवान की वाणी को भिन्न-भिन्न जीवों के समीप पहुंचाकर उसे सुख पूर्वक श्रवण योग्य बनाने आदि के पवित्र कार्य में अपनी सेवा से तथा सामर्थ्य समर्पण करने के कारण भगवान की सार्ववाणी को सार्वार्धमागधी नाम प्राप्त होता है । जब मगध देव उस भगवद वारणी की. सेवा करते हैं तो महात्माओं की सेवा का उन्हें यह पुरस्कार प्राप्त होता है कि उस श्रेष्ठ वारणी में सेवक के नाते उनका भी
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