SearchBrowseAboutContactDonate
Page Preview
Page 762
Loading...
Download File
Download File
Page Text
________________ अध्याय आठवां ] [ ६७३ जो दूध को सदोष सोचते हैं, दे पानी भी नहीं पी सकते ? पानी में जलचर जीवों का सदा निवास रहता है । उनका जन्म-मरण उसी के भीतर होता रहता 1 उनका मलमूत्रादि भी उसके भीतर हुआ करता है, फिर भी लोक जल को पवित्र मानते हैं । इसी प्रकार गतानुगतिकता या अंध परम्परा का त्याग कर यदि मनुष्य मस्तिष्क अनुभव तथा सद्विचार से काम लेगा, तो उसे शुद्ध साधनों द्वारा प्राप्त, मर्यादा के भीतर उष्ण किया गया तथा सावधानीपूर्वक शुचिता के साथ सुरक्षित किया गया दूध अभक्ष्य कोटि के योग्य नहीं देखेगा। यह देखकर भ्राश्चर्य होता है कि सरासर शुचि भोजन पान को करते हुये मांसाहार दोष के दोषी लोग अहिंसात्मक प्रवृत्ति बालों के उज्जवल कार्यों को भी सकलंक सोचते हैं। उन्हें रात्रि भोजन में दोष नहीं दिखता, जल के पीने में संकोच नहीं होता । अशुद्ध आहार आदि के भक्षण | करने में तथा मधु सेवन करने में निर्दोषता दिखती है। मधु की एक बिन्दु भक्षण करने में सात गांवों के ध्वंस बराबर जीव घात का पाप लगता है, किन्तु ये उसे निर्दोष, बलदायक मानकर बिना संकोच के सेवन करते हैं और अपने को अहिंसा व्रत सोचते हैं। अहिंसा के क्षेत्र में अंतिम प्रामाणिक निर्णय दाता के रूप में जिनेन्द्र की वाणी की प्रतिष्ठा है । उस जिनागम के प्रकाश में दूध के विषय से अभक्ष्यता का भ्रम दूर करना चाहिये । वैसे रसपरित्यागवती घी दूध आदि का त्याग इन्द्रियजय की दृष्टि से किया करता है । दिव्यध्वनि का विशेष स्वरूप -- दिव्य ध्वनि के विशेष विचार- मृदु, मधुर, प्रतिगंभीर और एक योजन प्रमाण समवशरण में रहने वाली बारह प्रकार की सभाओं में विद्यमान देव, मनुष्य और तिर्यञ्चादि सब संज्ञी भव्य जीवों को युगपत् प्रतिबोधित करने वाली दिव्य ध्वनि होती है । जैसे मेघ का पानी एक रूप हैं तो भी वह नाना वृक्ष और वनस्पतियों में जाकर नामा रूप परिणत हो जाता है, उसी तरह दांत, तालु-ओठ और कंठ आदि के हलन चलन से रहित वह वारणी १८ महाभाषा और ६०० क्षुद्र भाषाओं में परिणत होकर युगपत् समस्त भव्यजनों को प्रानन्द प्रदान करती है । अर्थ मागधी यह नाम भाषारूप है । कहा भी है--- मागध्यावन्तिका प्राच्या शौर संन्यर्धमागयो । वाहीकी दाक्षिणात्याच भाषाः सप्त प्रकीर्तिताः ॥ १६१२॥
SR No.090436
Book TitleGommat Prashnottar Chintamani
Original Sutra AuthorN/A
AuthorDigambar Jain Kunthu Vijay Granthamala Samiti Jaipur
PublisherDigambar Jain Kunthu Vijay Granthamala Samiti
Publication Year
Total Pages1124
LanguageHindi
ClassificationBook_Devnagari, Religion, & Karma
File Size37 MB
Copyright © Jain Education International. All rights reserved. | Privacy Policy