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[ गा. प्र. चिन्तामणि
जीव दया के विधातक होने से जैसे जिनागम में त्याज्य कहा है 'उसी प्रकार वे त्रिकालदर्शी महापुरुष जिनेन्द्र दूध को भी त्याज्य कह देते । दूध दुहने के बाद अंतर्मुहूर्त अर्थात् ४८ मिनट के भीतर उसे उपरण करने से बह निदोष हो जाता है, ऐसा जैनाचार
के ग्रन्थों में वर्णन है । भगवान को दूध में सदोषता ज्ञात होती तो वे तीर्थकर भगवान - की मूर्ति के अभिषेक के लिये दूध का क्यों विधान करते ? पद्मपुराण में भगवान के ___ जल, घृतादि के द्वारा अभिषेक का महत्त्व बताते हुये लिखा है---
अभिषेक जिनेन्द्राणां विधाय क्षीरधारया। विमाने क्षीरधवले नरागी जायते धुतिः ॥१६१०॥
जो जिनेन्द्र भगवान का दुग्ध की धारा द्वारा अभिषेक करते हैं, वे क्षीर सदृश धवल विमान में जन्म लेकर निर्मल दीप्ति को प्राप्त करते हैं।
हरिवंश पुराण में भी उक्त कथन का इस प्रकार समर्थन किया गया हैक्षीरेक्षुरसधारो घृतवध्युवकादिभिः । अभिषिच्य जिनेन्द्रामचिता नुसुरासरैः ॥१६११॥
क्षीर तथा इक्षुरस की धारा के प्रवाह द्वारा तथा धृत दधि जल मादि से जिनेन्द्र देव की अभिषेक पूर्वक जो पूजा करता है, वह मनुष्यों तथा सुरासुरों द्वारा पूजित होती है।
दूध के विषय में आयुर्वेद शास्त्र कहता है कि भोजन पहले खल भाग रूप परिणत होता है। इसके पश्चात् बह रस रूपता धारण करता है। बनवे के अनस्तर दूध का रक्त बनता है । शारोष्ण दूध को इसीलिये प्रायुर्वेद में महत्वपूर्ण कहा है कि तत्काल ही शरीर में जाकर रुधिररूप पर्याय को शीघ्र प्राप्त करता है । दूध को गोरस कहने से स्पष्ट होता है कि वह रस रूप पर्याय है । दूध के दुहने से गाय क्षीरण नहीं होती. किन्तु रक्त के निकालने से उस जीव में क्षीणता पाती है, वेदना की वृद्धि होती है । दूध के सेवन से सात्विक भावों का उदय होता है । रुधिर मांसादि सेवी नर राक्षस बन जाते हैं। दूध में मांस का दोष माना जाय, तो सभी मनुष्य मांसभक्षी व्याघ्र आदि की श्रेणी में श्रा जावेगे, क्योंकि बिना दूध पिये बालक का प्रारम्भिक जीवन ही असंभव है। शरीर रचना की दृष्टि से मनुष्य की समानता शाक तथा फलभोजी प्राणियों के साथ है । मांस भक्षी निरन्तर अशान्त, क्रूर, चंचल तथा दुष्ट स्वभाव वाले होते हैं । दूध के सेवन से ऐसी बात नहीं होती है।