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________________ दि. अध्याय : आठवा ] [ ६७१ निर्मित पदार्थों के दासा नररत्नों को सर्वत्र स्तुति की गई । उत्तम पात्र का आहारदाता या तो उसी भव में मोक्ष को प्राप्त करता है या स्वर्ग का सुख भोग कर वह तीसरे भव में मुक्ति को पाता है। भगवान को प्रथम बार याहार देने वाले व्यक्ति के भाव अवर्णनीय उज्जवलता प्राप्त करते हैं। इससे वह उत्तम दाता शीघ्र ही तप की शरण ग्रहण कर का उद्धार करता है। हरिवंश पुराण में कहा है-- ... ... . तपः स्थिताश्च ते केचिस्सिद्धास्तेनैव जन्मना । जिनांते सिद्धिस्तेषां तृतीये जन्मवि स्मृताः ।।१६०८॥ यह तो आध्यात्मिक श्रेष्ठ लाभ है, कि दाता मोक्ष को प्राप्त होता है। तत्काल दाता के भवन में अधिक से अधिक साढ़े बारह करोड़ और कम से कम इसका हजारवां भाग अर्थात् १२५००० एक लाख पच्चीस हजार रत्नों की वर्षा होती है । सत्पात्र के दान की अपार महिमा है । पंचाश्चर्य सत्पात्र को प्राहार दान देने में ही प्राप्त होते हैं । इससे इसकी महत्ता इतरदानों की अपेक्षा स्पष्ट ज्ञात होती है । इसका कारण यह है कि इस माहारदान से वीतराग मुनियों की रत्नत्रय के परिपालन में विशिष्ट सहायक उनके पवित्र शरीर का रक्षण होता है । गृहस्थ स्वयं श्रेष्ठ तप नहीं कर पाता है, किन्तु अपनी न्यायपूर्वक प्राप्त द्रव्य के द्वारा महाव्रती का सहायक बनता है । इस कारण पात्रदान द्वारा गृहस्थ के जीवनोपाय के षट्कमौ अर्थात् असि, मषी, कृषि, वाणिज्य, शिल्प और पशुपालन तथा चक्की, चूल्हा, बुहारी, उखली और पानी आदि पंचसूना क्रियाओं द्वारा अजित महान् दोषों का क्षय होता है । क्या दूध दूषित है-- दूध को दूषित सोचना यह दृष्टि विचार शुन्य है--ऋषभनाथ भगवान ने इक्षु रस लिया था, यह बात सर्वत्र प्रसिद्ध है । शेष तीर्थंकरों ने गोक्षीर से बनाये हुये श्रेष्ठ अन्न (खीर) का प्राहार किया था । कहा भी है--- प्राय नेक्षुरसो दिव्यः पारसायां पथित्रितः । अन्यगोंक्षीर निष्पपरमान्नमलालसैः ।।१६०६।। अाजकल कोई लोग नवयुग के वातावरण से प्रभावित होकर दूध को मांस सदृश दूषित सोचते हैं । यह दृष्टि विचार शून्य है। दूध यदि सदोष होता, तो परम दयालु सर्व परिग्रहत्यागी तथा समस्त सुखों का परित्याग करने वाले तीर्थकर भगवान उसको आहार में क्यों ग्रहण करते । मधुर होते हुए भी मधु को. नवनीत आदि को
SR No.090436
Book TitleGommat Prashnottar Chintamani
Original Sutra AuthorN/A
AuthorDigambar Jain Kunthu Vijay Granthamala Samiti Jaipur
PublisherDigambar Jain Kunthu Vijay Granthamala Samiti
Publication Year
Total Pages1124
LanguageHindi
ClassificationBook_Devnagari, Religion, & Karma
File Size37 MB
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