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________________ ......" mi - SPATIER- : ...". :47. 4 ६७० ] ६. गो. प्र. चिन्तामणि नादि सात गुणों से समलंकृत महाराज श्रेयांस ने राजभक्त में अक्षय तृतीया को एक वर्ष, एक माह नव दिन के पश्चात् तीन लोक के नाथ, आदिनाथ प्रभु को इक्षु रस का आहार दिया। प्रभु के कर कमल में पड़ती हुई इक्षु रस की धारा पुण्य की धारा सदृश प्रतीत होती थी । इस दान में विधि, द्रव्य, दाता, पात्र, सभी श्रेष्ठ होने से यह उत्तम श्रेणी का पात्र दान माना गया । यद्यपि वह इक्षु रस मल्य रहित था, इससे उसके देने से श्रेयांस महाराज को कोई उल्लेखनीय लोभ का त्याग नहीं करना पड़ा, फिर भी चक्रवर्ती भरतेश्वर ने महाराज श्रेयांस को महादान पति कहा है । महापुराणकार कहते हैं--- ततो भरतराजेन श्रेयानप्रच्छि सादरम् । महादानपते बूहि कथं ज्ञातमिदं त्वया ॥१६०६।। उत्तम पात्र के दान की महिमा अवर्णनीय है। चक्रवर्ती भरत कहते हैं, हे श्रेयांस ! तुम दान तीर्थंकर हो ! तुम महान पुण्यवान हो । 'त्वं दानतीर्थ कृच्छायान् त्वं महापुराण भासि । . .. .. पंचाश्चर्य---देवताओं ने इक्षुधारा से स्पर्धा करते हुये आकाश से रत्नों की धारा पृथ्वी पर बरसाई थी । मंद सुगन्ध तथा शीतल पवन बहने लगी थी। दिव्यपुष्पों की वृष्टि हुई थी । जय-जय शब्द का उद्घोष हो रहा था। देवदुन्दुभि की मधुर-ध्वनि हुई थी। इस प्रकार पंचाश्चर्य हुये थे। इस श्रेष्ठ पात्र दान के प्रभाव से दाता की देवताओं ने अभिषेक सहित पूजा की थी। हरिवंश पुराज में कहा है अभ्यचिते तपोवृद्ध्य धर्मतीर्थकरे गते । . . दान तीर्थकरं देवाः साभिषेकम पूजयन् ॥१६०७।। . धर्म तीर्थंकर वृषभदेव भगवान् की पूजा के पश्चात् तपोवृद्धि के हेतु प्रस्थान करने के अनन्तर देवताओं ने दानतीर्थकर महाराज श्रेयांस की अभिषेक पूर्वक पूजा की। भगवान को प्रथमदान देने का प्रभाव . तीर्थंकरों का सर्वप्रथम प्राहारदान और दान की महिमा तीर्थकर भगवान के सर्वप्रथम पाहारदान की बड़ी महिमा बताई गई है। हरिवंश पुराणा में कहा है कि अजितनाथ आदि तेईस तीर्थङ्करों ने तीसरे दिन प्रथम पारणा की है कि तृतीये दिवसेऽन्येषां प्रथमा पारणा यता । जिनेन्द्र भगवान को प्रथम पारणा के दिन क्षीरादि न
SR No.090436
Book TitleGommat Prashnottar Chintamani
Original Sutra AuthorN/A
AuthorDigambar Jain Kunthu Vijay Granthamala Samiti Jaipur
PublisherDigambar Jain Kunthu Vijay Granthamala Samiti
Publication Year
Total Pages1124
LanguageHindi
ClassificationBook_Devnagari, Religion, & Karma
File Size37 MB
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