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________________ अध्याय आठवां ] [ ६६६ महापुरुषों का आश्रय ग्रहण करने से मलिन व्यक्ति भी सम्मान को प्राप्त करते हैं । यह बात यथार्थ है, क्योंकि भगवान के मस्तक का श्राश्रय पाने वाले मलिन केशों को भी देवों द्वारा पूज्यता प्राप्त हुई । वस्त्राभरणमाल्यानि यान्युन्मुक्तान्यधोशिना । तान्यप्यनन्यसामान्यां निष्युरत्युरस्युद्धति सुराः ॥ १६० ॥ भगवान वस्त्र आभूषण तथा माला आदि का त्याग किया था । देवों ने उन सबकी असाधारण पूजा की थी । fe car के नीचे भगवान ने मुनि पदवी अंगीकार करते हुये निर्ग्रथ दीक्षा की थी, यह वृक्ष चादर धन्य हो गया। आज भी वैदिक लोग उस वटवृक्ष को 'अक्षय वट' मानकर आदर करते हैं । महान आत्माओं के जीवन से सम्बन्धित होने वाले छोटे तथा लघु भी पदार्थ गौरव को प्राप्त होते हैं । एकेन्द्रिय वृक्ष भी महत्वपूर्ण माना जाता है। केवल ज्ञान का वृक्ष 'अशोक वृक्ष' के रूप में प्रतिष्ठा को प्राप्त करता है । वृक्ष तो सचेतन है । भूमि भी श्रादर की पात्र बनती है । महान आत्माओं का प्रभाव चित्य है उनसे सम्बन्धित वस्तुओं के प्रति आदर का भाव व्यक्त करने के भीतर प्रभु के प्रति श्रद्धा भक्ति का भाव निहित है । यदि ऐसी दृष्टि न हो, तो फिर वही भक्ति लोक मूढ़ता का रूप धारण कर सम्यक्त्व की ज्योति को बुझा देती है । दृष्टि स्वच्छ तथा विमल होनी चाहिये । जिस चैत कृष्ण नवमी के दिन भगवान ऋषभनाथ भगवान तीर्थंकर ने समस्त परिग्रह को पाप सदृश निश्चय कर त्याग किया था तथा निग्रर्थ बने थे, वह दिन धन्य माना जाने लगा । सर्व साधन सम्पन्न जिन भगवान का समस्त परिग्रह त्याग For faशुद्धि का कारण होता है । दीक्षावृक्षों की ऊंचाई दीक्षा वृक्षों की ऊंचाई - श्री महावीर स्वामी को करों के दीक्षा वृक्षों की ऊंचाई उनके शरीर के बारह गुनी महावीर भगवान का दीक्षा वृक्ष ३२ धनुष ऊँचा था । बान तीर्थ की प्रवृत्ति- छोड़कर बाकी सब तीर्थअधिक समझना चाहिये । दान तीर्थ की प्रवृत्ति - लाभांतराय का क्षयोपशम होने पर विवेक, faar
SR No.090436
Book TitleGommat Prashnottar Chintamani
Original Sutra AuthorN/A
AuthorDigambar Jain Kunthu Vijay Granthamala Samiti Jaipur
PublisherDigambar Jain Kunthu Vijay Granthamala Samiti
Publication Year
Total Pages1124
LanguageHindi
ClassificationBook_Devnagari, Religion, & Karma
File Size37 MB
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