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________________ ६६८ ] [ गो. प्र. चिन्तामणि अवश्य करते, यदि प्रादिनाथ भगवान का मौन न रहता तो पाहार देने की विधि उनसे ज्ञात की जा सकती थी । इस सम्पूर्ण सामग्री को ध्यान में रखने से श्रेष्ठ तपस्या में उद्यत तीर्थीकरों की मौनी मानना उचित है, अनुभव तथा तर्क संगत है ! योग विद्या के अन्तस्तत्व को न जानने वाले भगवान के मौन का रहस्य नहीं जान पाते। उसके मर्म को अवगत करने वाले पूज्यपाद. महर्षि समाधि शतक में में कहते हैं जनेभ्यो बाक् सतः स्पन्दो ममसचित्त विभ्रमाः । भवन्ति सस्माससर्ग जनयोगी ततस्त्यजेत् ॥१६०२॥ लोक संसर्ग होने पर वचन प्रवृत्ति होती है। उससे मानसिक विकल्प उत्पन्न होते हैं । इससे चित्त में विभ्रम होता है । इससे स्वयंवेदन (स्वानुभव) में संलग्न श्रेष्ठ संयमी जन संसर्ग त्याग करे। पूज्यपाद स्वामी की वाणी के द्वारा भगवान की लोकोत्तर वीतराग वृत्ति पर प्रकाश पड़ता है। भगवान अध्यात्म के क्षेत्र में क्षण-क्षण में प्रगति करते जा रहे है । भगवान धुरिणत पौद्गलिया देह का परिणाम कर चिन्मूति मात्र रहना चाहते हैं । उनका लक्ष्य है वि देह बनना । इससे वे प्रात्मा में ही आत्म भावना करते हैं । इसका रहस्य समाधिशतक में इस प्रकार बताया गया है.--- देहान्तर्गते बोजं देहेऽस्मिन्नात्म भावना । बीजं विदेहनिष्परात्मन्येवात्म भावना ॥१६०३॥ एक शरीर को छोड़कर अन्य देह धारण का बीज शरीर में प्रात्म भावना है। विदेही बनने का अर्थात् शरीर रहित बनने का मूल कारण आत्मा में प्रात्मभावना है। भगवान के प्राश्रित रहने वाले पदाथों में पूज्यता कैसे मा जाती है--- तीर्थंकरों के आश्रित पदार्थों की पूज्यता--देवों ने भगवान के केशों को रत्नमय पिटारे में रखा तथा बड़े प्रादर पूर्वक उनको क्षीर समुद्र में क्षेपण किया। महापुराणकार कहते हैं महतां संश्रयान्तनं यांतीज्या मलिना अपि । . मलिनैरपि यत्केशः पूजाबाप्ताश्रितः गुरुम् ॥१६०४॥ - - HRAM .... NISHAN
SR No.090436
Book TitleGommat Prashnottar Chintamani
Original Sutra AuthorN/A
AuthorDigambar Jain Kunthu Vijay Granthamala Samiti Jaipur
PublisherDigambar Jain Kunthu Vijay Granthamala Samiti
Publication Year
Total Pages1124
LanguageHindi
ClassificationBook_Devnagari, Religion, & Karma
File Size37 MB
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