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अध्याय आठवां ]
भावार्थ- -इन सबकी हमेशा नव-यौवन अवस्था बनी रहती है । उन सबके केश शोभारूप उत्पन्न होते हैं और शोभा रूप ही बढ़ते हैं । इसलिये उनके क्षौर कर्म ( बाल बनवाना ) नहीं होता है अर्थात् तीर्थंकरादि कभी बाल नहीं बनवाते हैं, क्योंकि इतने नहीं बढते कि उन्हें कटवाना पड़े !
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एक यह बात भी विचारणीय है कि यदि तीर्थंकरों के मुख दाढ़ी-मूंछ के बाल माने जाय तो उनकी प्रतिमाओं में भी दाढ़ी-मूंछ के बाल मानने पड़ेंगे; परन्तु ऐसा है नहीं, इस लिये तीर्थंकरों के दाढ़ी-मूंछ का प्रभाव समझना चाहिये। कहा भी है-केश |दिरोमहीनांगं श्मश्रुरेखाविवर्जितम् t
स्थितं प्रलम्बितहतं श्रीवत्सादयं दिगम्बरम् ।।१६००।।
अर्थात् प्रतिमाएँ ऐसी होनी चाहिये जिन पर केशादि रोम न हों दाढ़ी मूछ के बाल न हो खड़गासन हो, हाथ लटकते हों, श्रीवत्स का चिन्ह हो और दिगम्बर हों। भगवान का दीक्षा लेने के बाद मौन से रहने का रहस्य --
मौनव्रत का रहस्य -- केशलोंच के बाद अब ये प्रभु संचमुच में महामुनि, मामौनी, महादम, महाक्षम, महाक्षम, महाशील, महायज्ञ वाले तथा महामख बन गए----
महामुनिर्महामौनी महाध्यानी महादमः ।
महाक्षमः महाशीलो महायज्ञो महामखः । १६०१ ॥
इन महामुनि प्रभु का मौन अलौकिक है । इनका मौन अब केवलज्ञान की उपलब्धि तक रहेगा। इनकी दृष्टि बहिर्जगत् से अन्तर्जगत् की ओर पहुँच चुकी है। इसलिये राग उत्पन्न करने की असाधारण परिस्थिति आने पर भी इन्होंने वीतराग वृत्ति को frosis रखा। इनके चरणानुरागी चार हजार राजाओं ने इनका अनुकरण कर दिगम्बर मुद्रा धारण की थी । परिषहों को सहने में असमर्थ होकर व राजा भ्रष्ट होने लगे । और भी विशिष्ट परिस्थितियाँ समक्ष आई | दुर्बल मनोवृत्ति वाला मानव ऐसे प्रसंगों पर मोह के चक्कर में फंसे बिना न रहता, किन्तु ये जिनेन्द्र महामोनी ही रहे ।
सभी तीर्थंकर दीक्षा लेने के पश्चात् मौन व्रती रहते हैं । यदि ऐसा कठिन महाव्रत न होता तो भगवान ऋषभनाथ सहदीक्षित चार हजार राजाओं को क्षुधादि की पीड़ा सहन करने में असमर्थ होकर धर्म मार्ग को छोडते समय उनका स्थितिकरण