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________________ प्र. चिन्तामरिण दिया है, 'राजा को रक्षर दक्षः स्थापितो भरतो मया ।' तुम भरत राजा की सेवा करना । भगवान ने एक बार पहले सर्वतोभद्र नरेन्द्र भवन परित्याग करते समय बन्धु वर्ग से पूछ लिया था, फिर भी उन जगत पिता ने सर्व इष्ट जनों को धैर्य देते हुये पुनः अनुज्ञा प्राप्त की। उस वन में चन्द्रकान्त मरिंग की शिला देवों ने पहले से ही रख दी थी। इन्द्राणी ने अपने हाथों से रत्नों को चूर्ण कर उस शिला पर चौक बनाया । उस पर चन्दन के मांगलिक छींटे दिए गए थे। उस शिला के समीप ही अनेक मंगल द्रव्य रखे थे। भगवान उस शिला पर विराजमान हो गये। आसपास, देव, मनुष्य, विद्या धरादि उपस्थित थे। भगवान ने वस्त्र, आभूषणादि का परित्याग किया । उस त्याग में आत्मा, देवता तथा सिद्ध भगवान साक्षी थे । महापुराण में लिखा है- तत् सर्वं विभुरत्याक्षीत नियंपेक्षं त्रिसाक्षिकम् । भगवान ने अपेक्षा रहित होकर त्रिसाक्षि पूर्वक समस्त परिग्रह का त्याग कर दिया। भगवान के केशलोंच करने का क्रम __ केशलोंच-अनंतर भगवान ने पूर्व की ओर मुख करके पद्मासन होकर सिद्ध परमेष्ठी को नमस्कार किया और पंचमष्टि केशलोंच किया । पंच अंगलि निर्मित मुष्टि के द्वारा संपादित केशलोंच करते हुये वे पंचमगति को प्रस्थान करने को उद्यत परम पुरुष द्रव्य, क्षेत्र, काल, भव तथा भावरूप पंचपरावर्तनों का मूलोच्छेद करते हुये प्रतीत होते थे। तीर्थंकर भगवान के दाढ़ी मछ नहीं होते। वे सदा सोलह वर्ष की अवस्था वाले पुरुष के समान सुशोभित होते हैं, इसलिए भगवान केवल शिर के केशों का ही पंच मुष्टियों से लोच करते हैं। कहा भी है--- देवावि रणारयाविय भोगभुवा चक्कि-जिरपरिदारणं । सब्वे केसब-राम-कामवि ग कुचिर्ण हुति ।।१५६६।। '. अर्थातचनिकाय के देव, नरकी जीव, भोग भूमियाँ, चक्रवती, तीर्थंकर, नारायण, बलभद्र और कामदेव के मुख पर दाढ़ी-मूछो के बाल नहीं होते हैं ।
SR No.090436
Book TitleGommat Prashnottar Chintamani
Original Sutra AuthorN/A
AuthorDigambar Jain Kunthu Vijay Granthamala Samiti Jaipur
PublisherDigambar Jain Kunthu Vijay Granthamala Samiti
Publication Year
Total Pages1124
LanguageHindi
ClassificationBook_Devnagari, Religion, & Karma
File Size37 MB
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