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अध्याय : पाठयां
[ ६६५ अनुशासन प्रदाता हो और जहां भगवान के वैराग्य के कारण प्रत्येक का ममता पूर्ण हृदय विशिष्ट विचारों में निमग्न हो, वहां झगड़ा उत्पन्न होने की कल्पना तक अमंगल रूप है । सभी लोक विवेकी थे । अतएव संपूर्ण कार्य व्यवस्थित पद्धति से चल रहा था। सौधर्मेन्द्र लो एक सौ सत्तर कर्म भूमियों में एक सौ सत्तर तक की संख्या वाले अनेक तीर्थंकर के कल्याणकों के कार्य संपादन करने में सिद्धहस्त तथा अनुभव प्राप्त हैं । प्रतः स्वप्न में क्षोभ की कल्पना नहीं की जा सकती।
प्रश्न--भगवान की दीक्षा विधि का वर्णन किस प्रकार है ? .
उत्तर--दीक्षा विधि--भगवान सिद्धार्थ बन में पहुँकर पालकी से नीचे उतरे । हरिवंश पुराण में लिखा है
अवतीर्णः स सिद्धार्थी शिविकाया: स्वयं यथा । देवलोकशिरस्थाया दिवः सर्वार्थसिद्धिसः ॥१५६६।।
सिद्ध बनने की कामना वाले सिद्धार्थी भगवान ऋषभदेव देवलोक के शिर पर स्थित पालकी पर से स्वयं उतरे, जैसे वे सर्वार्थ सिद्धि स्वर्ग से अवतीर्ण हुये थे । अब मुमुक्षु भगवान मोहज्वर से मुक्त होकर प्रात्म स्वास्थ्य की प्राप्ति के हेतु स्वस्थता सम्पादक तपोवन के ही वातावरण में रह कर क्रमश: रोग मुक्त हो अविनाशी स्वा. स्थ्य को शीघ्र प्राप्त करेंगे । उन्होंने देख लिया कि सच्चा स्व तथा पर का कल्याण अपने जीवन को आदर्श (दर्पण) के समान बनाना है । मलिन दर्पण जब तक मल रहित नहीं बनता है, तब तक वह पदार्थों का प्रतिबिम्ब ग्रहण करने में असमर्थ रहता है, इसी प्रकार मोह मलिन मानव का मन त्रिभुवन के पदार्थों को अपने में प्रतिबिम्बित कराने में अक्षम रहता है । भगवान ने यह तत्व हृदयंगम किया, कि आत्मा की कालिमा को धोकर उसे निर्मल' बनाने के लिये समाधि अर्थात् आत्म-ध्यान की आवश्यकता है । अत: एक चित्त वृत्ति को स्थिर बनाकर मोह को ध्वंस करने के लिए ही ये प्रभु आवश्यक कार्य सम्पादन में संलग्न हैं।
तीर्थङ्कर भगवान के कार्य श्रेष्ठ कहे हैं, अतएव तपस्या के क्षेत्र में भी इनकी अत्यन्त समुज्जवल स्थिति रहती है । वैराग्य से परिपुर्ण इनका मन आत्मा की ओर उन्मुख है । अब वह अधिक बहिर्मुखता को आत्महित के लिए बाधक सोच रहे है, अपने समीप पाने वाली प्रजा को प्रभु ने कहा 'शोकत्यजत भोः प्रजा' और प्रजाजन तुम शोकभाव का परित्याग करो। तुम्हारी रक्षा के हेतु भरत को मैंने राजा का पद