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[ मो. प्र. चिन्तामणि के शरीर का महा अभिषेक हुआ था। आज वैराग्य को प्राप्त मोक्षपुरी को जाकर अपने प्रात्म-साम्राज्य को प्राप्त करने को. उद्यत प्रभु के अभिषेक में भिन्न प्रकार की मनोवृत्ति है । आज तो ऐसा प्रतीत होता है कि बाह्य शरीर के अभिषेक के बहाने से ये सुरराज अन्तःकरण में जागृत ज्ञान ज्योति से समलंकृत प्रात्मदेव का अभिषेक कर रहे हैं। यह अभिषेक बाल रूप धारी तीर्थकर का नहीं है। यह तो सिद्ध वधू को वरण करने के लिये उद्यत प्रबुद्ध विरक्त जिनेन्द्र के शारीर का अन्तिम अभिषेक है । इसके पश्चात् इन बीतरागी जिनेन्द्र का अभिषेक नहीं होगा। आगे ये जिनेन्द्र सदा चिन्मयी विज्ञान गंगा में डुबकी लगाकर आत्मा को निर्मल बनावेंगे । अब तो भेद विज्ञान भास्कर उदित हो गया है। उसके प्रकाश में ये शरीर से भिन्न चैतन्य ज्योति देखकर उसे विशुद्ध बनाने के पवित्र विचार में निमग्न हैं।
दीक्षा पालकी-प्रात्म प्रकाश से सुशोभित जिन राज ने मार्मिक वाणी द्वारा सबको नग्न सत्य कहते हुए स्वयं अन्तःबाह्य नग्नमुद्रा धारण करने का निश्चय किया। वीतराग प्रभु अब 'सुदर्शना' . पालकी पर विराजमान हो गए । भूमि गोचरी राजाओं ने प्रभु को पालकी सात पैड तक अपने कन्धों पर रखी। विद्याधरों ने भी सप्तपद प्रमाण प्रभु की पालकी को वहन किया। इसके पश्चात् देवताओं ने प्रभु की पालकी कन्धों पर रखकर आकाश मार्ग द्वारा शीघ्र ही दीक्षावन को प्राप्त किया । यह सिद्धार्थ नाम का दीक्षा बन अयोध्या के निकट ही. था। भगवान का सारा परिवार प्रभु की विरक्ति से व्यथित हो रहा था । उसे देखकर ऐसा लगता था, मानो मोह शत्रु के विजयार्थ उद्योग में तत्पर भगवान को देखकर मोह की सेना ही रो रही है । चारों ओर बैराग्य का सिन्धु उद्वेलित हो रहा था। - प्रश्न--दीक्षा पालकी उठाने के प्रसंग पर क्षोभ की कल्पना करना उचित
है या नहीं?
उत्तर--कोई-कोई सोचते हैं भगवान की दीक्षा की बेला में उस प्रस्थान के पावन प्रसंग पर पालकी उठाने के प्रकरण को लेकर मनुष्यों तथा देवताओं में झगड़ा हो गया यह कल्पना अत्यन्त असंगत, अमनोज्ञ तथा अनुचित है। उस प्रसंग की गम्भीरता को ध्यान में रखने पर एक प्रकार से यह कल्पना सारशून्य ही नहीं अपवादपूर्ण भी प्रतीत हुये बिना न रहेगी। जहां विवेकी सौधर्मेन्द्र के नेतृत्व में सर्वकार्य सम्यक रीति से संचालित हो रहे हों। चक्रवर्ती भरत सदृश प्रतापी नरेन्द्र प्रजा के
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