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अध्याय : पाठवां
[ ६६३ पति होने से आत्मीय भाव से देखते थे । अब उनकी सम्पूर्ण दृष्टि बदल गई । एक चैतन्य आत्मा के सिवाय अन्य सब पदार्थ पर प्रतिभा समान होने लग गए । मोतिया बिन्दु वाले मनुष्यों के नेत्र में जाला पाने से वह अंध सदृश हो जाता है । जाला दूर होते ही उसे प्रकाश प्राप्त होता है । अपना पराया पदार्थ दिखने लगता है।
नीलांजना को अवलम्बन मनाकर मुधी समाज ने भगवान के नेत्रों को स्वच्छ करने में बड़ी चतुरता से काम लिया। भगवान के जन्म होने पर उस इन्द्र ने आनन्दित होकर सहस्त्र नेत्र बनाये थे । आज भी सुरराज मोह जाल दूर होने से आध्यात्मिक सौन्दर्य समन्वित विरक्त आदिनाथ प्रभु की अपने ज्ञान नेत्रों द्वारा नीरांजना करते हुये, आरती उतारते हुये अपूर्व शांति तथा प्रसन्नता का अनुभव कर रहा है। इसका कारण यह कि इन्द्र महाराज की जिनेन्द्र में जो भवित थी वह मोहान्धकार से मलिन नहीं थी। वह सम्यक्त्व रूप चिन्तामरिण रत्न के प्रकाश से दैदीप्यमान थी।
अब तक विरक्त तथा दिव्य विषयों में आसक्त रहने वाले देवर्षि रूप से माने जाने वाले लौकान्तिक देव अपने स्थान से ही जिनेन्द्र प्रणाम करते थे। सुदर्शन मेरु के शिखर पर सारे विश्व को चकित करने वाला जिनेन्द्र भगवान का जन्माभिषेक हुया ! वहां सभी चारों निकाय के देव विद्यमान थे, केवल इन विरक्त देषियों का अभाव था । ये वैराग्य के प्रमी कोकिल सदृश थे, जिन्हें अपना मधुर गीत प्रारम्भ करने के लिये बैराग्य पूर्ण बसन्त ऋतु चाहिये थी, जिरासे सब कष्टों का सदा के लिये अन्त हो जाता है । योग्य बेला देखकर ये देवर्षि भगवान के समीप आए।
प्रभु को प्रणाम कर कहने लगे, "भगवन ! आपने मोह के जाल से छूटने का जो पवित्र निश्चय किया है वह आप जैसी उच्च आत्मा की प्रतिष्ठा के पूर्णतया अनुरूप है। अब तो धर्म तीर्थ प्रवर्तन के योग्य समय आ गया है, "वर्तते कालो धर्म तीर्थ प्रवर्तने ।"
हे नाथ ! चारों गति रूप महाटवी में दिशाओं का परिज्ञान न होने से भटकते हुए जीवों को मुक्तिपुरी में पहुंचने का सुनिश्चित मार्ग बताइये । प्रभो ! अब
आपके द्वारा बताए गए मार्ग पर चलकर सत्पुरुष जन्म मरण के श्रम से से शून्य होकर बिलोक के शिखर पर जहां अविनाशी प्रामन्द है, पहुचकर विश्राम करेंगे ।
इसके अनन्तर चारों निकाय के देव पाए। उन्होंने क्षीर सरोवर के जल से भगवान का अभिषेक किया । जन्म कल्याणक के समय निर्मल शरीर वाले बाले जिनेन्द्र