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प्र. चिन्तामणि
तत्पूर्वभवसाय कौवहनगर नृणाम् । प्रवोचवृत्तमित्युच्चैः स मनोहरया गिरा ॥१५६७॥
वन का स्मरण कर मुख्य हाथी ने खाना पीना छोड़ दिया था। उसे देखकर सुनिसुव्रत महाराज ने अपने अवधिज्ञान रूपी नेत्रों से उसके पूर्व भव का सम्बन्ध जान लिया और मनोहर तथा ऊची वाणी से कौतुहल युक्त लोगों को वे समझा दिये थे । इससे स्पष्ट होता है कि तीर्थ कर भगवान गृहस्थावस्था में अवधिज्ञान का उपयोग करलें हैं। प्रश्न---तीर्थयार (छयस्थ) प्रभु की और मुनियों का मेल होता है या नहीं ?
और मुनिश्वरों की वन्दना करते या नहीं ? उत्तर-- उनका मेल होता हैं, परन्तु तीर्थ कर मुनीश्वरों की वन्दना नहीं करते हैं । एक दिन श्री कुन्थुनाथ चक्रवर्ती (तीर्थकर) वन विहार करके लौटे । अपने नगर में आते समय रास्ते में एक प्रातापनयोग साधु को देखकर उन्होंने अपनी तर्जनी अंगुली से मन्त्री को बताया था। उस समय मन्त्री ने मुनि को नमस्कार किया था, और तीर्थ कर (छअस्थ) प्रभु से पूछा था हे देव ! ऐसे दुर्धर तप करने से साधुओं को कौनसा फल मिल सकता है ? तब प्रसन्न मुख भगवान ने कहा था कि यदि कर्म नाश करे तो इसी भव मोक्ष चले जायेंगे । कदाचित् कर्म का नाश न हो तो इन्द्रादिक पद प्राप्त कर वे कर्म का नाश कर मुक्त हो जायेंगे ।
अशग कवि कृत वर्धमान चरित्र सर्ग १७ श्लोक ६२ में लिखा है कि विजय, संजय नाम के दो चरण मुनियों को किसी एक बात के अर्थ के विषय में सन्देह उत्पन्न होने के बाद अकस्मात् उनको श्री वर्धमान स्वामी का दर्शन होते ही वे निःसन्देह हो गये थे। तब अन्होंने बड़ी भक्ति भाव से वर्धमान स्वामी को 'सन्मति' यह नाम देकर वहां से प्रस्थान किया था । इसलिये तीर्थरों की (छदास्थ अवस्था में) मुनियों से भेंट होती है, यह सिद्ध होता है।
प्रश्न- सपकल्याणक का वर्णन किस प्रकार है ?
उत्तर---तपकल्याणक या परिनिष्क्रमण- भगवान की मोह निद्रा दूर होने से वे भली प्रकार जाग चुके । अब उन्हें कर्मचोर नहीं लूट सकते हैं । जगने के पूर्व में भगवान पिता होने के रूप में भरत, बाहुबली ब्राह्मी सुन्दरी को देखते रहे । पितामह होने के रूप में मरीचि आदि पौत्रों पर दृष्टि रखते थे। अयोध्या की जनता को प्रजा