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अध्याय : पाठवां ]
हुए आकाशरूपी आंगन के समान शोभायमान हो रहा था।
अभिरामं वपु तुंः लक्षौरभिजितः । ज्योतिभिरव संच्छम्न गमन प्रांगसं बभौ ॥१५६४।।
आज इस महान् विज्ञान के ज्ञाताओं का प्रायः लोप हो गया, इससे इस विद्या के महत्व को भी लोग भूलने लगे। जिन धरसेन महामुनि ने भूतबलि तथा पुष्पदन्त साधु युगल को महाकर्म प्रकृति प्राभूत रूप परमागम का उपदेश दिया था, वे सामुद्रिक विचा, स्वरशास्त्र, स्वप्न शास्त्र आदि में पारंगत थे । धबलग्रन्थ पृष्ठ ६७ में घरसेन आचार्य को 'अटुगमहारिणमित्त पारएग' शब्द द्वारा अष्टांग निमित्त विद्या के पारगामी कहा है । यह विज्ञान विद्यानुवाद नाम के दशमपूर्व में संग्रहीत है।
प्रश्न-लांछन या चिन्ह किसको कहते हैं ?
उसर--सीर्थङ्करों के जन्मकाल के दश अतिशयों में से "सौलक्षण्य" नामक एक अतिशय है, उस अतिशयानुसार उनके शरीर पर रहने वाले १००८ लक्षणों में से उनके दाहिने पर के अंगूठे में जो चिन्ह रहेगा उसको 'लांछन' या 'चिन्ह' कहते हैं । लिखा भी है
अम्मरणकाले जस्सदु दाहिरणपायम्मि होइ जो चिण्हं ।। तं लपखरण पाउत्तं प्रागमसुत्ते सुजिगदेहं ॥१५६४॥ प्रश्न-तीर्थकर भगवान गृहस्थावस्था में अवधिज्ञान जोड़ते थे या नहीं ?
उत्तर--तीर्थंकरों के जन्म से मति-श्रुत अवधि ये तीन ज्ञान रहते हैं । वे गृहस्थ अवस्था में अवधिज्ञान जोड़ते रहते थे। इस विषय में सोमसेन कृत लघुपनपुराण में लिखा है कि
पट्टहिस्तसामुक्तो भुक्ति करोति बुःखधाम् । सट्टष्टावधिनेत्रेण निनः प्राह जनान प्रति ॥१५६५॥
अर्थात्-एक दिन २०३ मुनिसुव्रत नाथ तीर्थ कर गृहस्थावस्था में अपने पुत्र के साथ सभा मण्डप में विराजमान थे। वहां जया पट्टहाथी का प्रसंग आया था, उस समय उन्होंने अपने अवधि ज्ञान से सब सभासदों को पट्टहाथी का वृतांत कह दिया था । अतः उत्तर पुराण में भी यह कथन पाया है
वनस्मरणसंत्यक्तकबालग्रहणं नृपः । . निरीक्ष्याथिनेत्रविज्ञानात्मनोगलम् ॥१५६६॥