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अध्याय : दसवां ]
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सता रहा है। जिससे धर्मध्यान में बाधा आती है। तब मुनिराज व साधु उसके निराकरणार्थ उपाय बतलाकर उसकी रक्षा करते हैं। साथ ही नमस्कार मन्त्र की आराधना करने का आदेश देते हैं। तब वह मिथ्यात्व नहीं । यदि मिथ्यात्व समझा जायगा तो "जैनसंहितायें" प्रतिष्ठाशास्त्र शिल्पशास्त्र प्रायश्वित्त शास्त्र तिरस्कृत हो हो जायेंगे अनादररंगीय हो जायेंगे । ऐसा समझने पर यशस्तिलक चम्पू देवसेन द्वारा रचित भावसंग्रह वामदेव रचित शास्त्र वसुनन्दी श्रावकाचार महापुरास लघुसकलकीर्ति शुभचन्द्र भट्टारक कृतास्त्र कथा कोष प्रवादरणीय हो जायेंगे । प्रथमानुयोग कथा पुराण सभी झूठे हो जायेंगे किन्तु ऐसा नहीं है । सभी कथायें, चमत्कार एवं घटनाऐं सत्य और जिन प्रणीत हैं । अकृत्रिम जिन चैत्यालयों में अकृत्रिम जिनबिम्ब यक्ष यक्षिणी सहित है । यह त्रिलोकसार में श्री नेमीचन्द्राचार्य ने लिखा है - मिथ्यादृष्टि देवों के निषेध के लिये सम्यग्दृष्टि देवों की पूजा सत्कार योग्य ही है । ताकि • सत्य देवाराधना निर्विध्न हो ।
[ जयपुर से हस्तलिखित डायरी, पं. कन्हैयालाल जी से प्राप्त ] ra चक्रवर्ती क्षायिक सम्यकदृष्टि किंचित भोगों की इच्छा पूर्ति के लिये चरत्न और अस्त्रों की पूजा करता है ।
इसके बाद और देखिये पट खण्डाधिपति की आयुधशाला में चक्ररत्न उत्पन्न होता है । वह चक्ररत्न जो अजीब है, उसकी भी चक्रवर्ती प्रष्टद्रव्य से पूजा करता है । श्रथ चक्रधरः पूर्जा चक्रस्य विधिवत् व्यधात् ।
सुतोत्पत्ति श्रीमानभ्यनन्ददतु क्रमात् ॥
श्रथान्तर श्रीमान् चक्रवर्ती भरत महाराज ने विधि पूर्वक चक्ररत्न की पूजा
की और फिर अनुक्रम से पुत्र उत्पन्न होने का आनन्द मनाया |
आदिपुराण प २६ पृष्ठ नं. १ जिनस्वामी कृत
भरत चक्रवर्ती ने मगध देव को जीतने के लिये भी मन्त्र तन्त्रों का सहारा लिया था, क्षायिक सम्यग्दृष्टि होकर भी ।
अधिवासित्जैत्रास्त्रः स त्रिरात्र मुपोषिषान् ।
मन्त्रस्मृति पूजामा सूचितत्योपगः शुचिः ॥१८०॥
जिसने मन्त्र तन्त्रों से विजय के शस्त्रों का संस्कार किया है । तीन दिन