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________________ : ८७२ } उपवास किया हो, मन्त्र के स्मरण से जिसकी श्रात्मा पवित्र हैं । स्त्रों की पूजा का प्रमाण --- [ गो. प्र. चिन्तामरिश आदिपुराण पर्व २८ पृष्ठ ३, द्वितीय भाग पुरोहित सरवस्तत्र कृती वयः । अध्यशेत शुचि शरयांदि व्यास्त्राभ्यधि वासयनः ।। १८०४ ।। वहां उन्होंने पुरोहित के साथ-साथ उपवासकर और दिव्य प्रस्त्रों की पूजा डा की पवित्र शय्या पर शयन किया। यहां प्रश्न होता है कि भरत चक्रवर्ती को अस्त्रों की पूजा करना क्या आवश्यक थी ? क्या वह मिथ्यात्वी था ? नहीं किन्तु यह व्यवहार है ! उसको इस प्रकार का करना ही पड़ता है जिनसे काम लेना है, उनका आदर सत्कार करना परमावश्यक है। चाहे वह क्षायिक सम्यग्दृष्टि क्यों न हो । आदिपुराण पर्व ३२ पृष्ठ ११६, उत्तरार्द्ध द्वि. खण्ड इत्यादि अनेक प्राचायों के मन्तब्य आगम में लिखे हुए हैं । सो सम्यग्दृष्टि श्रावक को उनके पद के योग्य उनका सन्मान करना ही चाहिये। अगर उनसे . बि.सी को द्वेष है तो सम्मान नहीं तो अपमान भी नहीं करना चाहिये । हमारे यहां द्वादशांगश्रुत में दसवां विद्यानुवाद पूर्व है, उस विद्यानुवाद पूर्व में, महाविद्या और काही वर्णन है और देव देवियों से ही सम्बन्धित वर्णन है और इन विद्याओं को सम्यग्दृष्टि श्रावक या मिथ्यादृष्टि जीव दोनों ही भोगों के लिये सिद्ध करते हैं -- ऐसा श्रागम का वचन है !. हां, ये विद्याएं निर्व्रन्थ भावलिंगी मुनि सिद्ध नहीं करते। इन साधुओं को विद्यानुवाद पूर्व का पाठ करते समय स्वतः सिद्ध हो जाती हैं। लेकिन वीतरागी साधु को भोगों की इच्छा नहीं रहती, इसलिए उन स्वत: सिद्ध हुई विद्यात्रों को कह देते हैं कि हमें तुमसे कोई कार्य नहीं है । अगर धर्म-प्रभावनार्थ, धर्म-रक्षणार्थ • कोई साधु निःस्वार्थ भाव से मन्त्रविद्याओं का सहारा लेता है, तो कोई दोष नहीं है । प्रभावना च प्रभाव्यते मार्गोऽनयेति प्रभावना, बाद, पूजा, व्याख्यान, मन्त्र, तन्त्रादिभिः सम्यगुपदेशै मिथ्यादृष्टि रोधं कृत्वाहं प्रणित शासनोद्योतनम् । मूलाचार प्रा. कुन्द. टी. पृ. १७४ जिसके द्वारा मार्ग को प्रभावशील किया जाता है, वह प्रभावना है । बाद, 'शास्त्र, पूजा, सिद्धचक्रविधानं महोत्सव प्रादि, दान, श्राहार, औषधि, अभय, व्याख्यान,
SR No.090436
Book TitleGommat Prashnottar Chintamani
Original Sutra AuthorN/A
AuthorDigambar Jain Kunthu Vijay Granthamala Samiti Jaipur
PublisherDigambar Jain Kunthu Vijay Granthamala Samiti
Publication Year
Total Pages1124
LanguageHindi
ClassificationBook_Devnagari, Religion, & Karma
File Size37 MB
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