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अध्याय : दसयां ]
[ ८७३ मन्त्र तन्त्रादिक से और इनके समीचीन उपदेश से मिथ्यादृष्टि के प्रभाव को रोक कर अहंन्त भगवान-कथित जैन शासन का उद्योत करना प्रभावना है । - विजयोदया--मन्ताभि ओग को दुग भूई कम्म मन्त्राभियोग क्रियां, कुतु हलोपदर्शन नियां, बालादीनां रक्षार्थ भूति कर्म च । ययुंज दे करोति यः । अभियोग भावरण कुणइ । अभियोग्या भावनां करोति । किं सर्व एव मन्त्राभियोगादी प्रवृत्तो नेत्याह, इढि रस साद हेदुं मन्ताभियोग को दुग भूई कम्म जो पउंजदे सो अभियोगभावरण कुणइ । द्रव्यलाभस्य, मृष्टाशनस्य, सुखस्य वा हेतुं मन्त्राथभियोग कर्म प्रयुक्ते यः स एव अभियोग्य भावनां करोति । तेन यः स्वस्य परस्य वा सायुरादि परिज्ञानार्थ मन्त्राभियोगं कुर्वन, धर्मप्रभावनार्थ कौतुकं उपदर्शयन् वैयावृत्यं वा प्रवर्तयामीति उद्यत: ज्ञान दर्शन चारित्र परिणामादर वर्तनान्नदुष्यतीतिभावः । ..
कुमारी वगैरह में भूत का आवेश उत्पन्न करना, अकाल में बुष्टि करके दिखाना ऐसे हारचर्य का प्रयोग करना जैसे प्रभावस्या के दिन आकाश में लोगों को चन्द्र दिलाना इत्यादि, किसी स्त्री या पुरुष को वश करना, उच्चारण करना, इत्यादि बालकादिकों का रक्षण करने के लिए भूति कर्म मंत्र प्रयोग करना अथवा भूतों की क्रीडा दिखाना ये सब क्रियायें यदि अपना ऐश्वर्य दिखाने के लिये अथवा सम्पदा दिखाने के लिये, मिष्टाहार के लिये किंवा इन्द्रिय जनित सुख के लिये यदि मुनि करेगा तो उसकी यह अभियोग्य भावना कही जायेगी, इस भावना के प्रभाव से जीव का जन्म वाहन जाती के देवों में हो जाता है, यदि कोई मुनि निज की अथवा दूसरों की आयु वगैरह जानने के लिये मंत्रप्रयोग करेगा, धर्मप्रभावना के लिये यदि वह कौतुक कारक अकाल वृष्ट धादिक दिखावेगा अथवा इन मंत्रादिकों से मैं मुनि का वैयावृत्य करू गा, ऐसा अभिप्राय मन में धारण कर यदि वह कौतुकादि करेगा तो दर्शन, ज्ञान, चारित्र परिणामों में आदर से प्रवृत्ति करने वाला होने से दूधरणीय नहीं है।
भगवती आराधना (मूला, रा.) पृ. ४०० गा. नं० १५२ किसी साधू की समाधि कब होगी, इसको जानने के लिये संघाधिपति प्राचार्य क्षपक की समाधि ज्ञान करने के लिए देवता को पूछते हैं---
खवयस्सुव संपण्णरस तस्स प्राराधणा अविक्खेव ।। विध्यणणिमित्तण य पडिलेहदि अप्पमतों सो ॥१८०५॥