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[ गो. प्र. चिन्तामणि वर्ती साधु की आहारक काय योग के समय में यदि पादुका अंश हो जाय तो उनका मरण भी हो जाता है, सो हो गोम्मटसार में मांगाधिकार के अन्तर्गत योग मार्गणाधिकार में लिखा है.- . . . . . . . . ... ... ... .. .:.., अंटवाधादी अंतोमुत्तकालदिदीः जहंण्णिादरे । .. पज्जत्तीसंपुणे मरणंपि कदाचिः । संभवई ॥१९२२॥
प्रश्न :-ऊपर श्राहारक शरीर का काल अंसमुहूर्त बतलाया उस समय वह . . . साधु अपने औदारिक शरीर से. गमन प्रागमन प्रादि क्रिया करे
या नहीं और यदि उसके विक्रिया ऋद्धि भी हो तो उस ऋद्धि के
शरीर को विनिया रूप चेष्टा कर सकता है या नहीं ? उत्तरः-प्रमत्त संयमो मुनिराज के एक काल में एक साथ ही वैक्रियिक काययोग की क्रिया में आहारक. योग की क्रिया नहीं होती। इससे सिद्ध होता है कि आहारक योग के समय प्रौदारिक वैक्रियिक शरीर से गमनागमनादिक क्रियाओं का नियम से अभाव रहता है, एक काल में दो क्रियाएं नहीं होती। सोही गोम्मटसार में योग भार्गसाधिकार में लिखा है----
धेमुध्विय आहारय किरिया ण समं पमत्त विरदम्हि ।
जोगो वि एकक काले एक्के य होदि पियमेरा ॥१६२३।। .. प्रश्न :--प्रौदारिक बक्रियक माहारक तेजस और कार्मण को उत्कृष्ट तथा
___ 'जघन्य स्थिति कितनी कितनी है ?
उसर :--ौतारिक शरीर की जघन्य स्थिति एक श्वास के अठारवें भाग है. । इसका वर्णन पहले लिख चुके हैं । वैक्रियिक की जघन्य स्थिति देव नारकियों की अपेक्षा दश हजार वर्ष है । सोही मोक्षशास्त्र में लिखा है--
दशवर्ष सहस्त्राणि प्रथमायाम् भवनेषु च व्यतराणां । तस्वार्थ सूत्र । अध्याय ४, सूत्र संख्या ३६-३७-३८ ।
तथा आहारक की जघन्य वा उत्कृष्ट अंतर्मुहूर्त है जो ऊपर लिख चुके हैं। तेजस की जघन्य स्थिति, कार्मरण की जघन्य स्थिति अन्य गति के गमन की अपेक्षा एक, दो, तीन समय है । सो ही मोक्ष शास्त्र में लिखा है--
एक द्वी श्रीन वानाहारकः । अध्याय २ सूत्र संख्या ३० ।
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