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अध्याय: दसवी
[ ६११ नासामुखे तथा नेत्र हृदय नाभि मंडले । स्थानेषु व्यंगितांगेषु प्रतिमां नैव पूजयेत् ॥१६१९॥ प्रश्न :--तीसरे मिश्र नाम के गुणस्थान में मरण नहीं है और न अन्य गति
की प्रायु का बंध ही होता है । तब फिर वह तीसरे गुणस्थान वाला जीव गतिबंध के बिना अन्यगति में किस प्रकार गमन
करता है ? उत्तर :--सम्यक् मिथ्यात्व प्रकृति के उदय से तीसरे मिश्र नाम के गणस्थान में रहने वाले जीव ने पहले या तो मिथ्यात्व के साथ प्रायु का बंध किया होगा या सम्यक्त्व के साथ आयु का बंध किया होगा । यदि मिथ्यात्व के साथ प्रायु का बंध किया हो तो वह मिथ्यात्व गुणस्थान में जाकर मरण करता है यदि उसने सम्यक्त्व के साथ प्रायू का बंध किया हो तो वह चौथे शास्थान में जाकर मरण करता है।
भावार्थ :-~-जो पहले सम्यक्दर्शन के साथ आयुबंध किया है, तो चौथे गुणस्थान में मरा कर शुभ गति प्राप्त करता है । यदि उसने मिथ्यात्व गुणस्थान में बंध किया हो तो वह मिथ्यात्व में ही मरण कर शुभ गति में उत्पन्न होता है, ऐसा श्री मोमट्टसार में प्ररूपणाधिकार के गुरणस्थानाधिकार में लिखा है, यथा
सो संजमण गिण्हति देसजमं दार बंधदे श्राऊ । सम्म वा मिच्छ वा पडिवज्जिय मरदि पियमेण ॥१९२०।। समस्त मित्थ परिणामेसु अहि पाउगं पुराबद्ध । तहि मरणं मरणं तसमुग्धादो विवरण सम्मि १११९२१॥ प्रश्न :-प्रमत्त नाम के छ8 गुणस्थानवर्ती मुनियों के प्राहारक शरीर
होता है । चैत्य बंदना करने, यात्रा करने का पदार्थों के निर्णय करने के लिये मस्तक से एक हाथ प्रमारग श्वेत पुरुषाकार प्रवेश निकलते हैं, केवली के दर्शन कर अथवा पात्रादि का अपना कार्य कर फिर वहीं प्राकर प्रवेश कर जाते हैं, ऐसे इस माहारक शरीर
को उत्कृष्ट जघन्य स्थिति कितनी है ? उत्तर :-ग्राहारक शरीर की जघन्य तथा उत्कृष्ठ स्थिति अन्तर्मुहर्त हैं । तथा म हारक शरीर पर्याप्ति की पूर्णता होने पर अाहारक योग काले छठे गुणस्थान