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अध्याय: सातवां ]
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शरीर की ऊंचाई सात हाथ होती है। और अन्त में आयु बीस वर्ष और शरीर की ऊंचाई साढ़े तीन हाथ रह जाती है ।
अति दुःषमा नामक छठवें काल के आदि मनुष्यों की आयु बीस वर्ष होती है, अन्त में सोलह वर्ष और शरीर की ऊँचाई एक हाथ रह जाती है । छठवें काल के अन्त में प्रलय काल याता है। प्रलय काल में सरस, विरस, तीक्ष्ण, रुक्ष, उष्ण, विष और क्षार मेघ क्रम से सात-सात दिन बरसते हैं । सम्पूर्ण प्रार्य खण्ड में प्रलय होने पर मनुष्यों बहत्तर युगल शेष रह जाते हैं। चित्राभूमि निकल आती है । बराबर हो जाती है । इस प्रकार दस कोड़ा-कोड़ी सागर का अवसर्पिणी काल समाप्त होता है । इसके बाद दस का कोडी सागर का उत्सर्पिणी काल प्रारम्भ होता है ।
उत्सर्पिणी के प्रतिदुषमा नामक प्रथम काल के श्रादि में उनचास दिन पर्यन्त लगातार क्षीर मेघ बरसते हैं, पुनः अमृत मेघ भी उतने ही दिन पर्यन्त बरसते हूँ । यदि मनुष्यों की श्रायु सोलह वर्ष शरीर की ऊंचाई एक हाथ रहती है और अन्त में मा बीस वर्ष और शरीर की ऊंचाई साढ़े तीन हाथ हो जाती है । मेघों के बरसने से पृथिवी कोमल हो जाती है । श्रौषधि, तरु, गुल्म, तृण आदि इस सहित हो जाते हैं । पूर्वोक्त युगल बिलों से निकलकर सरस वान्य श्रादि के उपभोग से सहर्ष रहते हैं ।
Hare fद्वतीय काल के यादि में मनुष्यों की आयु बीस वर्ष और शरीर की ऊंचाई साढ़े तीन हाथ होती है । द्वितीय काल में एक हजार वर्ष शेष रहने पञ्चम काल के चौदह कुलकर उत्पन्न होते हैं । ये कुलकर अवसर्पिणो काल राजाओं की तरह होते हैं। तेरह कुलकर द्वितीय काल में ही उत्पन्न होते हैं और मरते भी द्वितीय काल में ही हैं । लेकिन rear कुलकर उत्पन्न तो द्वितीय काल में होता लेकिन मरता तृतीय काल में है। चौदहवें कुलकर का पुत्र तीर्थंकर होता है। और तीर्थंकर का पुत्र चक्रवत होता है इन दोनों की उत्पत्ति तीसरे काल में होती है ।
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'दुषमा सुषमा नामक तृतीय काल के यादि में मनुष्यों की आयु एक सौ बीस वर्ष और शरीर की ऊंचाई सात हाथ होती है । और अन्त में श्रायु कोटि पूर्व वर्ष ओर शरीर की ऊंचाई सवा पांच सौ धनुष प्रमाण होती है, इस काल में शलाकापुरुष उत्पन्न होते हैं ।
सुषमा दुषमा नामक चोथे काल में जघन्य भोग भूमि की रचना सुषमा नामक