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________________ ( गो. प्र. चिन्तामणि पञ्चम काल में मध्यम भोग भूमि की रचना और सुषमा-सुषमा नामक छठे काल में उत्तम भोग भूमि की रचना होती है। चौथे, पांचवें पोर छठे काल में एक भी ईति नहीं होती है। ज्योति रंग कल्पवृक्षों के प्रकाश से रात दिन का विभाग भी नहीं होता है। मेघ वृष्टि, शीत बाधा, उष्ण बाधा, क्रूर मृग बाधा आदि कभी नहीं होती हैं। इस प्रकार दश कोड़ा कोड़ी सागर का उत्सपिरणी काल समाप्त हो जाता है। पुनः अवसर्पिणी काल पाता है। इस प्रकार अवसर्पिणी और उत्सर्पिणी काल का चक्र चलता रहता है। उत्सपिणी के दश कोड़ा कोड़ी सागर का एक कल्प होता है। एक कल्प में भोग भूमि का काल अठारह कोड़ा कोड़ी सागर है। भोग भूमि के मनुष्य मधुर भाषी, सर्व कला कुशल, समान भोग वाले, पसीने से रहित और ईर्ष्या, मात्सर्य, कृपरपता, ग्लानि, भय, विषाद, काम आदि से रहित होते हैं । उनको इष्ट वियोग और अनिष्ट संयोग नहीं होता । आयु के अन्त में जंभाई लेने से पुरुष की और छींक से स्त्री की मृत्यु हो जाती है। वहाँ नपुसक नहीं होते हैं। सब मृग (पशु) विशिष्ट घास को चरने वाले और समान आयु बाले होते हैं। अन्य भूमियों का वर्णन ताभ्यामपरा भूमयोऽवस्थिताः ॥११८७॥ भरत और ऐरावत क्षेत्र को छोड़कर अन्य भूमियां सदा अवस्थित रहती हैं। उनमें काल का परिवर्तन नहीं होता, हैमवत, हरि और देवकुरु में कम से अवसपिरणी काल के तृतीय, द्वितीय और प्रथम काल की सत्ता रहती है। इसी प्रकार हैरन्यवत, रम्यक और उत्तर कुरू में भी काल की अवस्थिति समझना चाहिये । हैमवत आदि क्षेत्रों में प्रायु का वर्णन एक द्वित्रिपल्योपमस्थितयो हैमवत कहारिवर्षक देवकुखकाः ॥११८८॥ हैमवत, हरिक्षेत्र तथा देवकुरु में उत्पन्न होने वाले प्राणियों की प्रायु क्रमशः एक पल्य, दो पल्य और तीन पल्य की है। शरीर की ऊँचाई क्रमशः दो हजार धनुष, चार हजार और छह हजार धनुष हैं । भोजन क्रमश: एक दिन बाद, तथा तीन दिन बाद करते हैं । शरीर का रंग क्रम से नील कमल के समान, कुन्द पुष्प के समान और कंचन वर्मा होता है। Rauainamruve -me- - - -
SR No.090436
Book TitleGommat Prashnottar Chintamani
Original Sutra AuthorN/A
AuthorDigambar Jain Kunthu Vijay Granthamala Samiti Jaipur
PublisherDigambar Jain Kunthu Vijay Granthamala Samiti
Publication Year
Total Pages1124
LanguageHindi
ClassificationBook_Devnagari, Religion, & Karma
File Size37 MB
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