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[ गो, प्र. चिन्तामणि प्रमाण है । वह सन्तान के दर्शन से उत्पन्न भय को दूर करता है । नवम कुलकर की प्रायु पल्य के सौ करोड़ भागों में से एक भाग प्रमाण है । वह सन्तान को आशीर्वाद देना सिखाता है। दशम कुलकर की आयु पल्य के हजार करोड़ भागों में से एक भा मारा है ।
वह बालकों के रोने पर चन्द्रमा आदि के दर्शन तथा अन्य क्रीडा के उपाय बतलाता है । ग्यारहवें कुलकर की आयु पल्य के दश हजार करोड़ भागों में से एक भाम प्रमाण है । उसके काल में युगल (युरुष और स्त्री) अपनी सन्तान के साथ कुछ दिन तक जीवित रहता है। बारहवें कुलकर की आयु पल्य के लाख करोड़ भागों में से एक भाग प्रमाण है। वह जल को पार करने के लिये नौका आदि की रचना कराना सिखाना तथा पर्वत आदि पर चढ़ने और उतरने के लिये सिढी प्रादि को बनवाने का उपाय बताता है । उसके काल में युगल अपनी सन्तान के साथ बहुत काल तक जीवित रहता है । मेधों के अल्प होने के कारण वर्षा भी अल्प होती है । इस कारण से छोटी-छोटी नदियां और छोटे-छोटे पर्वत भी हो जाते हैं। तेरहवें कुलकर की आयु पल्य के दश लाख करोड़ भागों में से एक भाग प्रमाण है। वह जरायु (गर्भ जन्म से उत्पन्न प्रारिखयों के जरायु होती है 1) आदि के मल को दूर करना सिखाता है । चौदहवें कुलकर की प्रायु पूर्व कोटि वर्ष प्रमाण है । वह सन्तान के नाभिनाल को काटना सिखाता है। उसके काल में प्रचुर मेघ अधिक वर्षा करते हैं। बिना बोये धान्य पैदा होता है । वह धान्य को खाने का उपाय तथा अभक्ष्य औषधि
और अभक्ष्य वृक्षों का त्याग बतलाता है। पन्द्रचों कुलकर तीर्थकर होता है । सोलहवाँ कुलकर उसका पुत्र चक्रवर्ती होला है। इन दोनों की आयु चौरासी लाख पूर्व की होती है।
सुषमा-सुषमा नामक चौथे काल के श्रादि में मनुष्य विदेह क्षेत्र के मनुष्यों के समान पांच सौ धनुष ऊंचे होते हैं। काल में तेईस तीर्थंकर उत्पन्न होते हैं और मुक्त भी होते हैं । ग्यारह चक्रवती, नव बलभद्र, नव वासुदेव, नव प्रतिवासुदेव और ग्यारह रुद्र भी इस काल में उत्पन्न होते हैं । वासुदेवों के काल में नव नारद भी उत्पन्न होते हैं तथा ये कलह प्रिय होने के कारण नरक में जाते हैं ! चौधे काल के अन्त में 'मनुष्यों की प्रायु एक सौ बीस वर्ष और शरीर की ऊंचाई सात हाथ रह जाती है । दुःषमा नामक पञ्चम काल के आदि में मनुष्यों की आयु एक सौ बीस वर्ष और