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[ गो, प्र. चिन्तामणि प्रारम्भ से ही उसकी विधि करनी चाहिये। यदि वह ऐसा न करे तो उसे महापापी समझना चाहिये।
प्रश्न :--प्रत भंग करने से महापाप लिखा है, सो वह कौनसा महापाप . .. लगता है ? ... उत्तर:-जो कोई जीव अपने गुरु से यम वा नियम रूप कोई व्रत ले लेवे और फिर चरित्रमोहनीय कर्म के उदय से उस व्रत को भंग कर देवे वह पुरुषं एक हजार जिन मन्दिरों के भङ्ग करने के समान पाप का भागी होता है । इसके समान और कोई पाप नहीं है । इसीलिये उसको महापापी कहते हैं । सो ही श्री श्रुतसागर प्रशीत व्रतकथाकोष में सप्त परमस्थान व्रत की कथा कहते समय लिखा है -
गुरुन् प्रतिभुवः कृत्वा भवत्येकं धृत वतम् । . सहस्त्रकूट जैनेन्द्र सबभताछ भागलम् ॥१६३०॥
इसलिये व्रत भङ्ग करने का प्रायश्चित अवश्य कर लेना चाहिये । प्रश्न :- पूजा करने वाला पूजन के लिये वस्त्र किस प्रकार धारण करता
उत्तर-जो भव्य पुरुष शांतिक और पौष्टिक के लिये भगवान की पूजा करता है, उसे सफेद वस्त्र पहिनकर पूजा करनी चाहिये यदि वह शत्रु पर विजय के लिये भगवान की पूजा करता है तो उसे श्याम बा काले वस्त्र पहिनकर घूजा करनी चाहिये । यदि वह कल्याण के लिये पूजा करता है तो लाल वस्त्र पहिनना चाहिये यदि वह किसी राजा आदि के भय को दूर करने के लिये पूजा करता है तो उसे हरे वस्त्र पहिनकर पूजा करनी चाहिये । यदि यह ध्यान आदि प्राप्ति के लिये पूजा करता है तो उसे पीले वस्त्र पहिनना चाहिये । और यदि वह किसी कार्य की सिद्धि के लिये पूजा करता है तो उसे पांचों रंग के वस्त्र पहिनने चाहिये । सो ही लिखा है -
शांतौ श्वेतं जये श्यामं रक्तं भये हरित् । धोतं ध्यानादिसलामे पंचवर्ण तु सिद्धये ॥१८३१॥
इस प्रकार अलग-अलग कामना की सिद्धि के लिये अलग-अलग पांचों वर्णो के वस्त्र बतलाये हैं। यदि इन पांचों वणों के वस्त्रों में भी कोई अयोग्यता के दोष श्रा जायं तो वह वस्त्र छोड़ देना चाहिये और दूसरा नवीन वस्त्र धारण करना चाहिये ।