________________
"
{ €१७
प्रश्न : - त्रिकाल पूजा की विधि क्या है ?
उत्तर -- चतुर भव्य जीवों को नियमपूर्वक तीनों समय भगवान की पूजा करनी चाहिये । उसकी विधि इस प्रकार है कि सबसे पहिले लिखी हुई विभि के अनुसार स्नानादिक कर भगवान की पूजा करनी चाहिये । उसको विधि इस प्रकार है- - प्रथम प्रातःकाल भगवान का जलाभिषेक करना चाहिये, फिर चन्दन केशर में कपूर मिलाकर भगवान के चरण कमलों की अर्चना करनी चाहिये यह प्रातःकाल की पूजा है । फिर दोपहर के समय नेक प्रकार के सुगन्धित और मनोग्य पुष्पों से भगवान की पूजा करनी चाहिये यह मध्यान्ह पूजा कहलाती है । तदन्तर शाम के समय दीप और धूप से पूजा करनी चाहिये ।
अध्याय : दसवां ]
भावार्थ - - प्रातःकाल तो चन्दन से पूजा करनी चाहिये । मध्यान्ह समय में पुष्पों से पूजा करना चाहिये और सायंकाल को दीपक से आरती उतारकर दीन से पूजा करनी चाहिये और सुगन्धित चन्दन अति शुभ द्रव्यों की बनी हुई धूप को अग्नि में दहनकर धूप से पूजा करनी चाहिये। यह त्रिकाल पूजा की रीति है । सो ही श्री उमास्वामी विरचित श्रावकाचार में लिखा है-
श्री चन्दनं विना नेव पूजां कुर्यात्कदाचन ।
प्रभाते घनसारस्य पूजा कार्या विचक्षणः ॥१६३२॥ मध्याह्न कुसुमं : पूजा संध्यायां दीप धूप थुक् । इस प्रकार त्रिकाल की जाती है वह वह विशेष का कुछ नियम नहीं है । सकती है ।
पूजा की रीति लिखी हैं। प्रथा प्रष्ट द्रव्य से जो पूजा पूजा है । इस अष्ट द्रव्य की पूजा को त्रिकाल में करने यह पूजा तो जिस समय की जाय उसी समय में हो
प्रश्न :-- सायंकाल को जो दीप धूप की पूजा की जाती है उसकी विधि क्या है ?"
:
उत्तर:- पूजन करने वाले पुरुष को पूजा करते समय भगवान के बाई श्रीर
धूपदान रखकर उसमें रखी हुई अग्नि में मंत्र पूर्वक धूप चढ़ाकर भगवान की पूजा
करनी चाहिये । तथा दीपक जलाकर भगवान के सामने मंत्र पूर्वक भारती उतारकर पीछे भगवान को दाहिनी ओर उस दीपक को रख देना चाहिए। यह पूजा का नियमसब जगह है, सो हो उमा स्वामी विरचित श्रावकाचर में लिखा है-