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________________ ६१८ j [ मो. प्र. चिन्तामणि वामांगे भुपदाहस्य दीप पूजा च सन्मुखी । अहंतो दक्षिणे भागे दोपस्य च निवेशनम् ।।१९३३॥ पूजा की ऐसी आम्नाय है, सो इसी प्रकार करना चाहिये । प्रश्न :- भगवान की पूजा में कैसे पुष्प चढ़ाना चाहिये तथा कैसे नहीं चढ़ाना उत्तर :-भगवान की पूजा में जल थल प्रादि के सार सुगंधित और मनोज्ञ ऐसे कमल गुलाब आदि अनेक प्रकार के जैन शास्त्रों में कहे हुए पुष्प चढ़ाना चाहिये तथा जो पुष्प हाथ से गिर गए हों, जमीन पर पड़ गए हों, जो किसी के पैर से छू गये हों, किसी के मस्तक पर रखे हों, मलिन और अपवित्र वस्त्र में रखे गये हों, नाभि के नीचे प्रदेश से छू गया हो, जो यवन (मुसलमान) आदि दुष्ट जनों के द्वारा स्पर्श किये - गये हों और जो कीडों से दूषित हों ऐसे पुष्प कभी नहीं चढ़ाना चाहिये, इसके सिवाय पुष्पों के दो तीन भाग कभी नहीं चढ़ाना चाहिये। भावार्थ-मोतिया, मोगरा, कुद आदि के पुष्पों में दो तीन चार पुष्प निकलते हैं, सो उनको अलग-अलग नहीं करना चाहिये । जैसा का वैसा ही चढ़ाना चाहिये पूजा के लिये फूलों की कलियां कभी नहीं निकालनी चाहिये अर्थात् पूजा में कलियां नहीं चाहिये । पूरा पुष्प ही बढ़ाना चाहिये । जो लोग चंपा और कमल के फूलों की कलियां अलग-अलग कर निकाल लेते हैं, अर्थात् उनको प्रफुल्लित कर लेते हैं, अथवा उनकी पंखुड़िया अलग-अलग निकाल लेते हैं, उनको जीव हिंसा के समान फल लगा करता है । इसलिये पुष्पों को अलग-अलग छिन्न भिन्न कर वा कलियां निकालकर नहीं चढ़ाना चाहिये । सो ही उमास्वामी विरचित श्रावकाचार में लिखा है-- हस्लात्प्रस्खलित क्षितौ निपतितं. लग्नक्कचित्पादयोः । पन्मूख ढेल वंगतं घृतं कुयसने नाभेरथो यद् धृतम् ।।१९३४॥ स्पृष्टं दुष्ट जनधनरभिहितं यदूषितं कीटकैः । त्याज्यं तत्कसुमं पदंति विबुधाः भवत्या जिनः पूज्यते ॥१९३५॥ नैव पुष्पं द्विधा कुर्यान्न छिन्नकलिकामपि । वंषकोत्पल भेदेन जीव हिंसा समं फलम् । E- HTiamuT-Amrapari.in SHARE: ::
SR No.090436
Book TitleGommat Prashnottar Chintamani
Original Sutra AuthorN/A
AuthorDigambar Jain Kunthu Vijay Granthamala Samiti Jaipur
PublisherDigambar Jain Kunthu Vijay Granthamala Samiti
Publication Year
Total Pages1124
LanguageHindi
ClassificationBook_Devnagari, Religion, & Karma
File Size37 MB
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