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अध्याय : दसवां ]
[ ६१६ ऐसा शास्त्रों का मत है। इसी प्रकार जल फल आदि आठों द्रव्य में से जो अयोग्य हो सो पूजा में नहीं लेना चाहिये । विवेकी पुरुषों को योग्य द्रध्य से ही पूजा करनी चाहिये।
प्रश्न :--अपर लिखे हुए पुष्प किस प्रकार चढ़ाना चाहिये ? उत्तर :-लौकिक शास्त्रों में ऐसा लिखा है-- पुष्पं चोद नवं देश प्रदेश को गुलम् ! .. · फलं च सन्मुखं देयं यथोत्पलं समर्पयेत् ।।१६३६।।
अर्थात् – पूजा में पुष्प तो ऊपर की ओर मुख कर चढ़ाना चाहिये । उसकी डोंडी नीचे की ओर रहनी चाहिये, नागवेल के पान आदि पत्रो को अधोमुखी चढ़ाना चाहिये । उसको प्रनी नीचे रहे और डंठल ऊपर-ऊपर को हो । तथा फल सामने चढ़ाना चाहिये। पुष्प पत्र और फल जैसे वृक्ष पर लगते. हैं उसी प्रकार उनको चढ़ाना चाहिये । यह नियम पुष्पमाला अथवा पुष्पांजलि के लिये नहीं है । पुष्पमाला और पुष्पांजलि में जिस प्रकार बन सके उसी प्रकार चढ़ाना चाहिये । प्रश्न :-पहले जो अष्टांग और पश्वशायि नमस्कार करना लिखा है, तो
इनका स्वरूप क्या है ? उत्तर :--अपने दोनों हाथ दो पैर एक मस्तक एक छाती और दोनों कपोल इस प्रकार पाठों अंगों को भूमि से स्पर्शते हुए नमस्कार करना सो अष्टांग नमस्कार
भावार्थ-पहले पृथ्वी पर दंड समान नीचे की ओर मुह कर सीधा सो जाना, जिससे दोनों पैर मस्तक छाती दोनों हाथ भूमि से लग जाय फिर क्रम में दांये बांये कपोलों को लगाना भूमि से स्पर्श करना । इस प्रकार नमस्कार करने को अष्टांग नमस्कार कहते हैं । सरे ही लिखा है ----
हस्तौ पादौ शिरश्चोरः कपोलयुगलं तथा । अष्टांगानि नमस्कारे प्रोक्तानि श्री जिनागसे ॥१६३७॥
दोनों हाथ दोनों पैर और मस्तक इन पांचों अंगों को भूमि में स्पर्शते हुए नमस्कार करना पंचांग नमस्कार है । सो ही लिखा है
मस्तकं जानुयुग्मं च पंचोपानि करौ नतो।