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[ गो. प्र. चिन्तामरिणः पश्चद्धशायि नमस्कार का स्वरूप. इस प्रकार है। पशु गाय को कहते हैं । गाय के समान प्राधा सोना जिससे पीछे के आधे अंग तो खडे रहें और आगे का प्राधा अंग अति दोनों पैर और मस्तक पृथ्वी पर नम जाय । पैरों के दोनों घुटनों से नमकर गर्दन से मस्तक को नीचा करना पश्व शायि नमस्कार है.। . . . .
भावार्थ-खड़े पैरों से बैठकर दोनों हाथों को कोनी से नवाकर तथा पृथ्वी पर रखकर अपना मस्तक झुकाना सो पश्वद्धशायि नमस्कार है। सो ही लिखा है
अत्र प्रोक्तानि पश्वर्द्ध शयनं. पशुवन्मतम् । .....
इस प्रकार नमस्कार के तीन भेद हैं, सो जैसा अपने से बन सके, वैसा भावपूर्वक देव शास्त्र गुरु को नमस्कार करना चाहिये।
इनमें से स्त्रियों के लिये अष्टांग और पंचांग का अधिकार नहीं है। उनको केवल पश्वर्द्धशायि नमस्कार करने का अधिकार है। पुरुषों को तीनों प्रकार के नमस्कार करने का अधिकार है । यह बात मूलाचार में प्रायिकाओं को वंदना करते समय समयाख्याधिकार में लिखी है
पंच छह सत्त हत्थे सूरो अज्झावगोय साधूय । ... परि हरि ऊरपज्जागो गवासरगरणेव वंदति ॥१९३८॥
इसका अर्थ एक सौ ग्यारहवीं चर्चा में लिखा है । जब प्राजिका भी गवासन से ही प्राचार्यादिक को बंदना करती हैं, तो फिर अन्य स्त्रियां अष्टांग वा पंचांग नमस्कार किस प्रकार कर सकती हैं ? उनके लिये अष्टांम वा पंचांग नमस्कार करना अयोग्य है। इसलिये नहीं करना चाहिये ।
प्रश्न :---पूजा करते समय किसी के हाथ से जिन प्रतिमा पृथ्वी पर गिर
___ जावें तो उसका प्रायश्चित क्या है ?
उत्तर :- जो पूजा करते समय जिन मूति पृथ्वी पर गिर पड़े तो पूजा करने वाले को उस मूर्ति का शुद्ध जल तथा गंधोदक पर्यंत भरे हुए एक सौ प्रांठ कलशों से मंत्र पूर्वक भगवान का अभिषेक करना चाहिये ! फिर पूजा कर एक सौ पाठ मूल मंत्रों से पाहूति देकर फिर वहीं विराजमान कर देना चाहिये । ऐसा इसका प्रायश्चित है । सो ही जिनसंहिता में आठवें अधिकार में लिखा है
पतिते जिनबिम्बेऽष्ट्रशतेन स्नापयेद् घटः । अष्टोत्तर शतं कुर्यान्मूल मन्त्रण चाहतीः ।।१६३६॥