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अध्याय: दसवां ]
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इस प्रकार मूर्ति के गिर पड़ने पर बहुत से लोग बिना समझे केवल अपने मन से ही किसी सचित्त वस्तु के खाने का त्याग कर देते हैं वा उपवास एकासन आदि कर लेते हैं, वा करा देते है, सो शास्त्र की विधि से विपरीत है ।
प्रश्न :- पूजा करते समय मंत्र पूर्वक नैवेद्य आदि चढ़ाने में किसी के हाथ से वह नैवेद्यादि पृथ्वी प्रादि अन्य क्षेत्र में गिर जाय पूजा के स्थान में न चढ़ाया जा सके बीच में ही गिर जाय तो क्या कहना चाहिये ?
उत्तर :- पूजा करते समय मंत्र पढ़कर द्रव्य चढ़ाना चाहिये । यदि वह द्रव्य ate में ही गिर जाय तो उसे छोड़ देना चाहिये। फिर जो द्रव्य गिरा हैं, उसी द्रव्य को लेकर और उसी मंत्र को पढ़कर एक सौ आठ बार आहुति देनी चाहिये अर्थात् अक्षत गिरा हो तो अक्षत का मंत्र पढ़कर अक्षत की एक सौ आठ ग्राहुति देनी चाहिये । यदि पुष्प गिरा हो तो पुष्प की एक सौ आठ श्राहुति देनी चाहिये ।
इस प्रकार जलादिक आठों द्रव्यों में से जो द्रव्य गिरा हो, उसी का मंत्र पढ़कर एक सौ आठ प्राहुति देनी चाहिये। फिर बाकी की पूजा पूर्ण करनी चाहिये । यही इसका प्रायश्चित है । सो ही संहिता के बारहवें अधिकार में लिखा हैप्रपति बलिपिडस्य जिन मन्त्र मन्त्रवित्
अष्टोत्तर शतं कुर्यादाहूतीस्तद्विधिक्रमात् ॥१४०॥
प्रश्न : --- यदि कोई हीन जाति का प्रस्पृश्य मनुष्य निबंध का स्पर्श कर लेवे तो उस मूर्ति का क्या करना चाहिये ?
उत्तर :- जो जिनबिंब गिर जाने का प्रायश्चित है, वही प्रायश्चित अस्पृश्य - मनुष्य के द्वारा जिनबिंब के स्पर्श कर लेने पर करना चाहिये । प्रर्थात् उस मूर्ति का
एक सौ आठ कलशों से अभिषेक कर पूजा कर मूल मंत्र से एक सौ आठ आहुति देनी चाहिये फिर उसको वहीं विराजमान कर देना चाहिये । सो ही पूजासार में लिखा हैअस्पृश्य जनसस्पर्शेप्येवमेव जिनेशिनाम् ।
प्रश्न : --- यदि किसी के हाथ से प्रतिमा का भंग हो जाय तो क्या करना
चाहिये ?
उत्तर:- यदि किसी के हाथ से जिन प्रतिमा भंग हो जाय तो उसी तीर्थंकर की अन्य प्रतिमा का एक हजार आठ शुद्धजल के कलशों से तथा पंचामृत से मंत्र
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